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Full text of "Aarogyaadarsh"

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ओआीयुस विज्ञालियिज्ञ डेरेक्टर आफ पबलिक इन्स्ट्र- 
कान सहाझाय की आज्ञानसार परटिचसात्तर और 
अवध की एणठशालाओं के निमिस छापा। 


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[ म्ल्य प्रति धरे &)॥ आाने। 


आरोग्यादश । 
अथात 
पारीर निराग रख्ले की रीति | 
नो 
प्रथम पुस्तक 


के क्मननानन-+- की फमकीन पजरिनलनाओने, 


भ्रमिका । 


९. आारोग्यता की मयाद।। 
आराग्यता दरीर की एक अतिउत्तम अवश्या है। आ- | 
रोग्यता की दशा में हम केवल अपनाही कांम नहीं कर सकते | 
परन्तु ओरों का मी सहायता दे सकते हैं। बीमारी से हमारा 
एल घट जाता है और इसी कारण हम घर के लागों का भार' 
कान पड़ते हैं। बीमारी की दशा में राजा के भी राजभवन | 
अं सुख नहीं मिलता परन्तु उस द्रिद्र मजूर का जा निराग 
$ैपना जीवन केसा भला जान पड़ता है ॥ 
लड़के का भी बीसार हे ना कैसी चिन्ता की बात है क्योंकि | 
तू ह पाठशाला जाने और अच्छे खेला के खेलने के बदले खाट 
तर पड़ा और ज्वर से पीड़ित रहता है। यदि वह अधिक | 
णीमार हाजाय ता घर के सब लेाग चिन्ता में पड़ जाले हैं ॥ 
जब किसी बच्चे की मा बीमार पड़ जाती है तब 
भर भी दुदंशा दाती है। खुशीला सा आरोाग्य रहने पर 
दिन मर एर का कास काज किया करती है। यदि वह बहुत 
बीमार होजाय ता उसका चलने फिरने की 'भी शक्ति नहीं | 
रहती और उसके अपना काम दूसरों से कराना पड़ता है ॥ 
किसी बच्चे के बाप का घीसार हो जाना कैसे अमाग्य | 
की बात है। प्रायः लोगों के अपने नियाह के लिये प्रतिदिन 
काम करना पड़ता है। बीमारी सें बहुत से मज़ूर मज़ूरी 
व कर, 


( *+* ) 


नहीं कर सकते और इसके सिवाय उनका ओऔषधि का 
दाम और डाक्टर की फीस भी देनी पड़ती है। इस दा में 
संभव है कि उनका ऋण छेना पड़े जिसके कारण उनके 
कुटुम्थ का बहुत दिन तक कषु सागना पड़े । यदि बाप 
मर जाय ता उसकी र्द्री गबिधवा और उसके बच्चे अनाथ 
हो जाते हैं । यह कैसी आपस्ति की बात है ॥ 
अब तुभका जान पड़ेगा कि यह कैसी आवश्यक बास है| 
कि सथ लाग निरोग रहने का यज्ञ करें | आराग्यता की दर 
उसी समय जान पडती है जब हम उसे ख्म बेठते हें ॥ 
२. आाशेरग्यता के विनाश के कारण । क्‍ 
काहे २ मन॒ष्य सममभले हैं कि बीमारी प्रारब्ध था। 
देवयाग से होती है इसमें किसी का बस नहीं चलता । परन्तु 
प्रारब्ध या देवयाग काइ चीज़ नहीं है। जब हम बीमार पड़ते 
। हैं तब बीमारी का कोई न कोई कारण अवदय होता है ॥ | 
३. आरोग्यता की विद्या जानने के लाभ । 
._ 'सानिटरी"”” यह दाव्द लाटिन भाषा के एक 
शब्द से निकला है जिसका अथ निरोग है। हम आरोग्यता 
लाभ करने की विद्या से आराग्य रश्ना सीखते हैं | रागों 
के घटाने की जो २ युक्तियां दी ज्ञा सकती हैं उनके हम।| 
अन्य देशों से भी सीख सकते हैं ॥ 
इस देदा में ज्वर की विसारी सबसे अधिक प्रचलित | 
है। कभी किसी के न देकर और कभी केवल ज्वरहीं। 
आता है। प्रायः प्रत्येक मनुष्य को एक न एक दिन ज्वर आही। 
जाता है| किसी समय में इंग्लिस्तान के कहे भागों में 
ज्यर से लागां का बैसाही कष् था जैसा कि अब हिन्दु- 
स्तान में है परन्तु आज कल वहां बहुत कम है । अनुमान से सा 


चलन अं इओओओणे ७७ न जजजत++ >>. >न «ले 23०००... 
















* कूसका दूसरा नाम “च्ाइक्ीन हे, का यूनानी काषा के एक शब्द से निकला | 
है छिसका अथ निराम है। शब्द “सानिटेशन” की काम में लाया लाता थे । 


जि उकं॥.. ५ #ाकसकजकर्तकत, 











गा 
( ह| ) 
बष हुए कि इंग्लिस्तान में इतने काढ़ी थे कि बड़े २ नगरों 
में काढ़ियां के अस्पताल थे परम्तु अब एक भी नहीं है । 
शीतला का रोग घिनवना और घातक है। पूर्व समय में 
शीतलारोग से गांव के गांव उजड़ जाते थे और उसके । 
कारण लगभग सोाधाह मनुष्य कुरूप और अन्ध हो जाते थे ।| 
अस्सी वष हुए होंगे कि एक अंग्रेज़ी डाक्टर (वैद्य) ने जांच 
की कि गाय के थनोीं पर एक ऐसा दाना (फुनसी) होता 
है जिसके चेप से शीलला रुक जाती था उसका यल घट | 
जाता है। अब इंग्लिस्तान में पहिले की अपेक्षा इस रोग से 
बहुत कम लेाग मरते हैं और यदि सब लेाग सावधान रहें 
ता एक मन॒ष्य भी न सरे । 

यदि शंग्लिस्तान की नाइ इस देश सें भी छपाय' 
किये जायें ता लागों दी आराग्यता अधिक बढ़ जायगी । 
सब लोग जानते हैं कि अग्नि जलती है परन्तु बहुतेरे लाग 
अपनी निर्वेदता और बीमारी का कारण नहीं जानते | 
|हस छोटी सी पुस्तक से यह बात विदित होगी कि सनुद्य 
निराग और पुष्र॒ कैसे रह सकता है। इसकेा भली भांति 
पढ़े। और इसकी शिक्षा के अनुसार चलने का प्रयत्न करो ॥ 
| जीवन और आराग्यता के लिये जिन बातों की हम 
के आवद्यकता है उनमें से हर एक का वर्णन छुदा २ 
किया जायगा ॥ 


'बफलााका८आररकएकभनरकानक2१:२६० दम, 


१। शुह् वायु । 


९: वायु जार जिन बस्तओं से बायु 
बनी है उनका वबशन। 
४. यिना खाये पिये हम कई दिन तक जी सकते हें 
परन्तु बिना थायु के थाड़ीही देर में मरजाते हैं । जन्मतेही | 





.._ थे) 


हमारा प्रथम काम सांस का लेना है; हमारे जीवन का अंत 
काम सांस का निकल जाना है। जन्म से मरने तक साले 
जागते हम निरन्तर सांस लिया करते हैं । इसलिये वायु 
ऐसी बस्तु है जे हमारे जीवन के लिये विशेष करके आव- 
इयक है 

धायु का हम नहीं देख सकते और जब नहीं चलती 
लथ हसकीा उसका अनुभव भी नहीं हाता | जब वायु चलती 
है उसे अह्रेज़ी भाषा में ““ विण्ड ” कहते हैं। चलने के समय 
वह हसका जान पड़ती है और उसका प्रभाव भी दिस्वाई 
देता है। कभी २ वायु इतने बेग से चलती है कि बड़े २ वृक्ष 
. से उखड़ जाते हैं ॥ 

जैसे समुद्र की भूमि जल से एकी रहती है वैसेही 
समस्त भूमि वायु रूपी सस॒द्र से ढकी है जिसमें हम वैसेही 
चलते फिरते हैं जेसे मछलियां जल में । वायु का समुद्र 
कम से कम्त सा सील गहिरा है परन्तु ज्यां २ हम ऊपर 
चलते हैं वायु हलकी होती जाती है ॥ 

जब हम कहवा पीले हैं तब बहुधा चार बस्त मिलाकर 
पीते हैं अथात्‌ कहवा, पानी, चीनी और दूध । बहुत दिन 
हुये लोग समझते थे कि वायु# एकही बस्तु से बनी है 
परन्तु विद्ञानां ने यह निणय किया कि इसमें चार सुख्य। 
बसतु हैं जा एक दूसरे के संग अद्भुत प्रकार से बुद्धिमानी 
के साथ मिलाई गई हैं ॥ 

५. संसार से तीन प्रकार के पदार्थ हैं। काई २ पत्थर 
और लकही वे समान हैं जिनका अद्वरजी भाषा में ' सालि- 
ड्स ” अथात्‌ दृढ़ पदाथ कहते हैं; कोई २ जल और दृ७ के 
समान हैं जिनका अक्षरज्ों भाषा से ''लिक्षिड्स  अथात्‌ 


23०->«>«>कह-+-+२० ५५५ ५ >किमन-नत- पट पिकन थक ४कएण 7: ही हि कक हम 



































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# सिटी आर जल लता भी सदका्दो तत््य समभते थे परनन्‍त यह बात मालम हे 
च्ज्जो 
है कि उनमे भी कई बघ्तगें मिली हे ॥ 









.। ७ ) 


द्रव पदार्थ कहते हैं और जे। वायु के समान हैं उनके अबरे ज़ी 
भाषा सें “प्याखेज़ ” अथात्‌ साधारण बायु कहते हैं ॥ 
जिन “अयासों ” से वायु बनी है उनका हम अलग कर 
ताल सकते हैं। उनमें से एक का नाम अछरेज़ी भाषा में 
“आक्सिजन ' है। जीवन का सहारा निश्चय करके यायु 
का यही भाग है। बिना “आक्सिजन ” के दीपक नहीं 
जल सकता। परन्तु जा निरे “आक्सिजन ”” ही से बनी 
होती ता हम शीघ्र मर जाते क्योंकि वह इतनी तीज होती 
है कि सही नहीं जा सकती | इसी कारण '““आक्थिजन 
में दूसरे प्रकार की बस्तु मिलाईं गई है जिसके अहरेज़ी भाषा 
में “नाइट्रोजन ” कहते हैं । इसमें और '““आक्सिजन ”! परे 
बड़ा अन्तर है। इससे जीवन का सहायता नहीं मिलती और 
इसमें जलता हुआ दीपक तुरन्त बुक जाता है। दानों “प्यास '' 
ऐसे परिमाण से मिली हुई हैं कि हस सांस ले सकते हैं 
ओर दीपक जल सकता है । तुम्हारे हाथ में एक अंगठा है 
आर चार अंगुलियाँ । इनसे तुमका यह बात स्मरण रखने में 
[सहायता मिल सकती है कि वायु में एक भाग “आदि्सि-| 
जन# का रहता है और चार भाग “नाइद्रोजन ' के ॥ 
लगभग सब यायु इन्हीं दानों “उयासों ” से बनी 
हैं| परन्तु इनका छोड़ ओर भी दा भाग हैं। यद्यपि 
नका परिमाण बहुत कम है ताभी थे बड़े काम के हैं ॥ 

६. तुम जानते हा कि कायला क्या है। कायला वह 
काले रह की पसतु है जे किसी चीज़ से ढक कर लकड़ी के 
उलाने से बनती है। चावल या सांस से भी एक प्रकार का 
के।पला बन सकता है। शुद्ध कायले का न भाषा 
सें “'कारयन””। कहते हैं । जे बसतु “आक्सिजन'” और 


जरक क्‍ैनिननिनान-ने वनन-नननमन ॥»+-- +7+-9-+- किन +ल 


















श 'र>3->म०« >> बन ननन-मनान ७०५ ५ ७४०9७७५०»५+> ७3 --+ ७ 


अ्तिजन संसार में श्रत्यन्त साधारण खस्सु है । साठे जार सेर जल में खार सेर 
: £ ब्रॉक्तिलन हैलो दे। धरतो में “ ग्राक्तिजन ” आधा भाग से अधिक मिलो रहतो हे # 
| जो मी लत, मिलो व जल ओा बहुत तती जे का, छोरे में “ क्रार्बन ” प्रिला थे जिसके बहुत तेज अ्रग्न में कला सकते हे ॥ 








का (६) 


| “कारबन के संये।ग से बनती है'उसके “का रबेनिक एसिड 
ग्यास' कहते हैं और यह वह तीसरी बस्तु है जे। वायु में पाई 
जातो है। यह एक प्रकार की भारो “प्यास है जा कभी २ 
गहिरे कुओं के नीचे में एकट्टी हा जाती है। यदि इस प्रकार 
की “ग्यास'' में बरता हुआ दीपक ले जायें ता वह तुरन्त 
बुक जाथगा और घदि यह “ ग्थास'' सांस लेने सें भीतर 
जाय ता मनुष्य तुरन्त सर जायगा। परन्तु इसी “पास ' 
से दक्षों का मुख्य करके पालन होता है जिसके बिना वे बढ़ 
नहों सकते | सदा इस “भ्यास'' को पोधे स्वींचा करते हें । 

शुद्ध वायु में २५०० भागों में से एक भाग के लगभग 
“कारबानिक एसिड ग्यास' रहती है अथात्‌ १३) २० में 
एक पा हे भर। इतनी थाड़ी “ग्यास' से हमारी कुछ भी 
हानि नहीं हाती है परन्तु यदि इसका अधिक भाग रहे ता 
हम दुबेल और रोगी हो जाते हैं । 

चाथी बस्तु जे वायु में पाई जाती है थेड़ी सी जल 
की माफ है | यदि तुम किसी बत न में थेड़ा जल भर दा ता 
बह धीरे २ सूख जाता है। सूय्य की गर्मी से जल भाफ बनकर 
सदा ऊपर उठा करता है जिससे बादल बनते, आस पड़ती, 
और पानी बरसता है। यदि वायु में जल की भाफ न हा ठी 
ता हमारा शरीर कुलस जाता और वृक्ष खूख जाते ॥ 

जा चार बस्तु# वायु में पाई जाती हैं वह “आक्सि- 
जन, नाइट्रोजन, कारये। निक एसिड ग्यास और जल की 
भाफ हें। जब ये बस्तु उचित रीति से मिली रहती हैं ता 
वायु शुद्ध रहती है और हमें निरोग ओर पुष्ठ रखती है। 

२. वायु के बिगढ़ने के कारण । 

७. जीवन के लिये हमका केवल वायुद्दी की आव- 

| श्यकता नहीं है जि पन न  प ओ उस वायु की जा शुद्ध हे। | संसार में 


जि चनियण हज डणड अनशन वलनलनाओ- पा फककन-पजन-नपणन- न पताएण अधिलपनााओ 











* ओर भी के एक बस्‍तुएं हैं जिन के परश्माया बचुत क्रम हैं । 


( ७ ) 
अनेक प्रकार के विष होते हैं परन्तु जिस जिष से प्राथः लेग मर 
जाते हैं वह विगढ़ी हुई यायु है। बहुत से वष बीले कि 
कलकसा' नगर में एक दिन, राल के समय, १४५९ मल॒ष्य एक 
।छाटे बन्दीगह में जिसका नाम “ब्लेक हाल” (अधात काल | 
(काठरी) था और जिसमें केबल दाही छेटी २ खिड़कियां थीं 
न्दू कर दिये गये। दूखरे दिन प्रातःकाल जब द्वार खेला गया 

केवल २३ ही मलुष्य लड़खडाते हुए बाहर निकले ओर सब | 
सर गये। उनके मरने का क्या कारण हुआ | निःसन्देह बिगड़ी | 
वाधु | धद्यपि एक रात में हन दीन सनु॒च्यां के समान घबहुतही 
| कम मनुष्य मरते हैं परन्तु ऐसे बहुत लाग हैं जा जन्म भर शुद्ध | 
वाघु के न मिलने के कारण दुबल ओर रोगी बने रहले हैं ॥ 

जिन २ कारणों से घायु दिगड़ जाती है उत्तमें से कुछ 
कारणां का वणन किया जाथगा ॥ 

(१) सांस लेना । 

हम सदा सांस लेते हैं परन्तु जे वायु सांस के 
साथ बाहर निकलती है और जे वायु सांस लेने में भीतर 
जाती है इन दाने में वड़ा अन्तर है । जिन लागों के स्वभाव 
में त्वच्छता है वे अपना हाथ छुंह धाने के सिवाय प्रतिदिन 
स्नान करते हैं। परन्तु ले बायु सांस लेने में हमारे शरीर के 
भीतर जाती है उससे सदा भीतर का भाग दुद्ध हो जाता 
है ओर मैल्ल वायु सें मिलकर निकल जाता है। जिस कारण 
ऐसा होता है उसका थाड़ा दृत्तान्त यह है॥ 

जब हम सांस लेते हैं तब वायु हमारे फेफड़े में जा छाती 
के भीतर बड़े २ स्पंज के खमान रहता है जाती है। वायु की 
नलिका सें लाखां छोटी २ नलिकाएं जिनमें वायु रहती है लगी 
हुई हैं और इन नलिकाओं में अनगिनित रुघिर की रगें मिली 
हुईं हैं। इन दानों के बीच में ऐसी सक्स ( पतली ) है) शरीर के हे के 


सदा रुधिर और वायु का संयोग होता रहता है। दारीर के 





( ८ ) 


सम्पूण भागों का बिगड़ा छुआ मैल जे। रुधिर में मिल जाता | 
हे वह इस र॒ृध्म भिल्ली के दारा निकल जाता है और शुद्ध | 
“थभराक्सिजन ' रुधिर में जा मिलती है। इस प्रकार काला 
और बिगड़ा रुघिर लाल ओर स्वच्छ हो जाता है ॥ 

८. ला वायु सांस के साथ बाहर निकलती है उस 
में मिलकर ये तीन बसतु निकलती रहती हैं । 

(अ) “कारबानिक एखिड ग्यास “--शुद्ध वायु में 
इस “उयास ' का बहुतही थाड़ा भाग रहता है परन्तु जा 
वायु सांस के साथ बाहर निकलती है उसमें यह “प्यास 
इसके सागुनी के लगभग होती है। धद्यपि इस वायु का हम 
देख नहीं सकते तथापि यह हमारी सांस के साथ उसी प्रकार 
से निकलती रहती है जेसे आग से धुआँ निकला करता है।। 

बन्द्‌ काठरी में आग जलाने से घुआँ शीघ्र भर जाता है। इसी 
प्रकार यदि हम किसी बन्द काठरी में साथें तो हमारे चारों 
आर की वायु में  कारबवेनिक एसिड ग्यास भर जायगी। 
जा स्वच्छ वायु न मिले ता हम तुरन्त मर जाय॑गे परन्तु 
द्वार के ऊपर नीचे से कुछ बिगड़ी वायु बाहर चली जाती।| 
है और कुछ अच्छी वायु भीतर आ जाती है॥ द 

(ब) जल की भाफ--जा तुम किसी “स्लेद ' पर 
सांस ले ता उसपर सील आ जायगी । इससे यह बात | 
स्पष जान पड़ती है कि तुम्हारी सांस में जल है ॥ 

(स) बिगड़ी हुईं व्यथ बसतु-सांस में जे जल। 
होता है वह झ्ुड नहीं है। उसमें सड़ी हुईं वस्तु मिली। 
रहती हैं जिनका शरीर में रहना रोग का कारण होता है।| 
इनसे उतनीही हानि हाती है जितनी “कारबेनिक एसिड/। 
ग्यास से होती है ॥ 

चैपाये बकरियां कुसे और दूसरे जन्तु हमारे समान | 
लेते हैं और इस्फ्रे केक्चायु विगड़ जाती है ॥ 


हि 


(२) पदाथां का जलना । 
धह वात कह आये हैं कि '“आक्सिजन '” के बिना आग 
नहीं जलती । यदि तुम किसी दिया का एक बतन सें रकसेा 
ओर फिर उसके बन्द करदे तो वह तुरन्त बुक ज़ायगा, 
क्योंकि उस वतन की वायु की सब ““आक्सिजन ”” “ कार-| 
बानिक एसिड ग्यास ' के बनने में लग जाती है। सब प्रकार 
की आग और दिया से वायु इसी भांति ज्लगड़ा करती है॥ 
(३) पदाथां का सड़ना । 

जब कोइ वृक्ष सूख जाता है अथवा कोई जन्त 
हे तब वह शीघ सड़ने लगता है। फिर उसमें से बड़ी हा नि- 
कारक ““उधासेज़ ” निकलने लगती हैं और इनके छोटे २ 
परमाणु वायु में मिल जाते हैं । यदि हमारी आंखें हमारी 
नाक के समान तीछ्ण होतीं ता हम जन्‍्तु की सड़ी हुइई 
लेथ से बहुतेरे छोटे २ परमाणु निकलते ओर वायु में फैलते 
देख सकते। जब ये परमाणु सांस लेने में हमारे दरीर दे 
भीतर जाते हें तब नाक का इनका बाध हाता है। इसी 
ज्ञान का गन्ध कहते हें ॥ 

केले के छिलका ओर दूसरे प्रकार के खर पात से, जो 
घर के निकट फेंक दिये जात हैं, वाघु बिगड़ जाती है । 
जहां कसा३ईं, चमार और रइरेज़ अपना काम काज करते 
हैं वहां की भी वायु बिगड़ जाती है। मझुदों के गाड़ने और 
जलाने के स्थान बस्सी के पास न होना चाहिये॥ 
घरती से भी भाफ निकलती है। कुछ न कुछ वायु 
घिरती के भीतर जाती है जा भाफ के साथ निकलकर 
ऊपर की वायु मे मिल जाती है॥ 

धरती सें सील होने के कारण बस्तु बहुत सड़ने लगती 
हैं। ऐसा अनुमान किया जाता है कि सड़ी हुई पत्तियां पौधे 
[आदि ज्बर के घुख्य कारण हें । 

























( १० ) 


तीन मुख्य बातें जिनसे वायु बिगड़ जाती है यह हें 
सांस लेना, पदार्थां का जलना और सड़ना ॥ 
वायु के स्वच्छ रखने के उपाय ॥ 
१०. यदि वायु के स्वच्छ करने के उपाय न होते ता 
।थह संसार निवास (रहने) के थाग्य भी न रहता। झुख्य 
उपाय नीचे लिस् जाते हैं ॥ 
हे (१) “५यासों का आपस में मिलना ॥। 
धघदि तुम जल में थाड़ा सा दूध डाला तो वह जल में 
सिल जायगा | जा घुआं आग से उठता है वह वायु में 
फैल जाता है यहां तक_कि कुछ भी दिखाई नहीं देता | 
यही दशा बिगड़ी हुईं प्रायु की भी है जो सांस के साथ 
निकलती है। वह आसपास की शुद्ध वासु में मिल जाती 
है और जेसे २ मिलकर खध्म होती जाती है वैसे २ उसके 
दाष घटते जाते हैं ॥ 
(२) चलती वायु । 
जा दुर्गन्ध सड़ती हुई वस्तुओं से निकलती है उसकेा 
चलती हुईं वायु उड़ा ले जाती है इस कारण वायु झञद्ध 


स्वच्छ रहती है ॥ 
(३) पौधे । 


पशुओं के सांस लेने में “ आक्सिजन '” भीतर जाती 
है और “कारवानिक एसिड ग्यास ” बाहर निकलती है । 
दिन का पोधे “कारवानिक एसिड ग्यास ” का अलग 
करके “कारबन ' अथवा कोयले का अपने में रख लेते हें 
और ““आक्सिजन ' का बाहर निकाल देते हैं। इससे वायु 
के स्वच्छ रहने में अत्यन्त सहायता मिलती है। सच है 
कि रात का पौधों में “आक्सिजन  प्रविष्ट होती है और 
“ कारबेनिक एसिड ग्यास ” बाहर निकलती है परन्त 
प्रविष्द होने की अपेक्षा आक्सिजन ' अधिकतर बाहर 











रा 


( ११ ) 


निकलती है। ताभी जिस क्राठरी में पैधे हों ठसमें सेना 
अच्छा नहा ॥ 

ग्यासां के परस्पर मिलने से और चलती वायु और 
पौधों से वायु स्वच्छ हाती है। पानी बरसने से भी वायु 
के स्वच्छ होने में सहायता मिलती है ॥ क्‍ 

४. स्वच्छ वायु मिलने का सपाय | 
१. निमल वायु का अनसभाल हाना ऊपर वणन हो 

घुका है| सड़े हुये पदार्थों से और शरीर से जा हानिकारक 
बसतु निकलती हैं इससे वे दूर हो जाती हैं और हमके पुषृ 
ओर आराग्य रहने सें सहायता मिलती है ॥ 

सदा यही यत्ञ करो कि जिसमें स्वच्छ बायु बहुतायत 
से मिले । दिन का हम प्रायः बाहर जाते हें परन्तु रात केा 
घर में साते हैं। इस बात की विद्येष आवश्यकता है कि रात 
के हमें शुद्ध वायु मिले। यह बात कैसे है| सकती है इसका 
घेणन घरों के वणन में किया जायथगा ॥ 

ऐसा न होना चाहिगे कि हमारे आसपास की वाशसु 
मैली ओर सड़ी हुईं बस्तुओं से विगड़ जाय | यद्यपि इससे 
हम तुरन्तहीं मर नहीं जाते तथापि हमका हानि पहुंचती 
है | तीधण विष से तुम तुरन्त मर जाआगे परन्तु थाड़ा 
सा भी विष खाना सूख्वता है ॥ 

भले चंगे लाोगां की अपेक्षा रोगियां के कारण घायु 
बहुत शीघ्र विगड़ जाती है। इसलिये रागियां के अधिकतर 
हझुद्ध वायु की आवदयकता है ॥ । 

धाहर यहुतस्ी निमल वायु होने पर भी थह ् 
हयक है कि हमारे शरीर के भीतर भी बहुतसी निमल वायु 
जाय । स्पंज या काईह कपड़े का हुकड़ा ढीला रहने पर बहुत 
।जल साखता है। ज्यों २ अधिक दबाया जाता है त्यथां २ 
थाड़ा जल उलमें समाता है | ठीक ऐसीही दशा हमारे 












| (१३२ ) 


फेफड़े की है। जितनाही थाड़ा दबाव उसपर पड़ेगा उतनाही 
अधिक वायु का प्रवेश उसमें होगा और उसी के समान 
रुधिर भी अधिक शुद्ध होता जायगा | काय्य करने या लिखने 
के समय लागों का झुकना उचित नहीं है क्योंकि इससे फेफड़ा | 

(दब जाता है और वायु भीतर जाने से रुक जाती है। शरीर 
का सीधा रखना अधिक आरोग्यता का कारण है ॥ 











२॥ निमेल जल । 
१. जल की ज्रावश्यकता । 
१२. जल की आवद्ययकता प्रत्येक प्राणी और वृक्ष आदि 
को है। जल के. बिना न ता कोई प्राणी जी सकता और न 
बनस्पति हरी (डहडही ) रह सकती है ॥ 

हमारे शरीर में जल का भाग अधिक है । यदि किसी 
मलुष्य की ताल ७५ सेर हो ता उस में जल का भाग ५६ सेर 
के लगभग होता है। इस यात्त के लिये बहुत से यथाथ प्रमाण 
हैं। जब हम माजन करते हैं तब वह हमारे आमाशय (सेदा ) | 
में मांड़ के समान है। जाता है। उपयागी भाग जा दूध के 
समान होता है रुघिर हे! जाता है और व्यर्थ भाग बाहर 
निकल जाता है। रुधिर छोटी २ नलियों में होकर शरीर के| 
सब सागां में फैठकर उनका पोषण करता है। जितने जल 
की आवश्यकता दारीर में है यादि उतना न होता तो रुघिर 
इतना गाद़्ा हो। जाता कि वह छोटी २ नलियों में, जिनमें से 
बहुतरी बाल से भी अति खक्ष्म हैं, बह न सकता | जा 
जल हम पीले हें वह रुधिर में मिल जाता है और इस प्रकार 
अरोर के प्रत्थेक अछ में पहुंचता है। यदि जल बिगड़ा हो 

ता हमारी आरोग्यता में विकार उत्पन्न करेगा ॥ 
प्रायः लाग स्वच्छ जल का ग्रुण घहुत थाड़ा जानते 








( १३ ) 
हैं। जब काई मनुष्य परदेश जाने पर बीमार पडता है तथ प्रायः 
वह यही कहता है कि में जल के कारण रोगी हुआ । परन्‍्तु। 
लेग अपनी जन्म भूमि छाड़े बिना दृषित जल पीने से बीमार | 


हो जाते हैं। इसी कारण अनेक राग उत्पन्न होते हैं | स्वच्छ | 


जल की उतनीहीं आवद्घकता है जितनी निमल वायु की ॥ | 

स्वच्छता के लिये भी जल उपयागी है । हम जल से | 
अपना झारीर धोते हैं । पानी बरसने से पाधे धुल जाते हैं| 
ओर उनका सिचाव भी हो जाता है। इसी जल से सूत्र 


पर के कूड़े बह जाते हैं ७ 


२. जल के मिलने के मुख्य हेतु॥ 
(१) बरसात का जल। 
१३. जल के मिलने का सुख्य कारण बरझखात है । 
यद्यपि सब नदियां बहकर ससझुद्र में गिरती हैं तथापि वह 


[भर नहीं जाता है। इसका क्या कारण है! जहां से ये नदियां 
निकलती हैं वहों पर फिर लेट जाती हैं ॥ 


सूथ्य की गर्सी के कारण जल से 'भाफ उठा करती है। 
जिससे आस, हिस (बफ़े ) या जल बन जाता है। जब पानी | 


बरसता है तब कुछ जल बहकर नदियां और तालाबों में चला 


जाता है और बहुतसा भूमि में समा जाता है जिरूसे भूमि । 
गीली हा जाती है और कुएं और मरनों में पानी पहुंचता | 
है। जहां बड़ी ठण्ड पड़ती है, जेसे हिमालय पर्वत की चाटी 


पर, वहां जल हिम ( बफ) के रूप में होकर गिरता है और 


गर्मियों में गल जाता है ॥ क्‍ 
बरसात के दिनों में नदियां उमड़ती हैं और तालातों। 
और कुंआओं में जल बढ आता है। गर्मी में नदियों और ताला- 
वां का जल घट जाता है और कभी २ रूख भी जाता है ॥ | 
इस प्रकार जल का हेर फेर हुआ करता है। नदियों, 
का जल समुद्र में जाता है वहां से माफ द्वाकर उठता है 


( रै४ ) 
और फिर जल बनकर बरसता है और अन्त में वह बहकर 
।समुद्र में चला जाता है ॥ 

जब पानो बरसता है तब वह बहुत कुछ स्वच्छ रहता है। 
कभी २ लाग बरसात में मकान की छतों का जल एकट्ठा करते 
हैं परन्तु मिद्दी, पक्षियों की बीट और दूसरी मैली बस्तुओं से 
यह जल थाड़ा बहुत बिगड़ जाता है भ्राय/ जब छत चारस 
होती है तब विगाड़ अधिक होता है। जब जल घरती पर बहता 
है तब उसमें कीचड़ ओर सड़नेवाले पदाथ मिल जाते हैं ॥ 

(२) नदियां । 

१४. प्रायः बड़ी २ नदियां का जल अच्छा होता है ।| 
बरसात के दिनों में मिद्दी के बह आने से उनका जल गदला 
हा जाता है । जब कुछ काल तक जल थधिराता है तब वह। 
स्वच्छ हो जाता है या फिटकिरी और निमली से भी तुरन्त 
स्वच्छ हा सकता है। यद्यपि किसी दलदल था जंगल का 
जल स्वच्छ देख पड़े तथापि प्रायः उसमें सड़ी हु३ं बनस्पति 
मिली रहती है जिसस कि ज्वर का आजाना सम्भव है। यदि 
[दूसरा जल न मिले ता उसी का ओटकर पीना चाहिये ऐसा | 
करने से सड़ी हुईं बनस्पतियां का विष निकल जाता है ॥ | 

कपड़े के घाने या जन्तुओं के नहलाने से नदियां का 
जल बिगड़ जाता है| यह काम उस स्थान पर न होना चाहिये 
जहां का जल पीने के लिये लिया जाता है| उस स्थान से 
बहाव की ओर आगे बढ़कर कपड़ों का धोना और जनन्‍्तुओं 
का नहलाना उचित है ॥ 

प्रायः लोग नदियां के किनारे था उनके पेटे से भी 
'मैला करते हैं । जब जल बरसता है तब मेला बहकर 
नदी में चछा जाता है। सुर्द और जा लेाग हैज़ा या 
शीतला से मरते हैं र्नकी लाथें कभी २ नदियों में शाल 








दी जाती हैं और उन छलाथों की राख भी जा किनारे पर 


( १५ ) 


जलाईे जाती हैं उनमें फेंक दी जाती है। प्रायः ऐसा भी 
होता है कि नदियों में कूडा करकट फ्रेंका जाता है | क्‍ 
इसी कारण बड़ी २ नदियों का भी जल बिगड़ जाता 
है परन्तु बहुधा देखने में आया है कि जब नदी बहुत छोटी | 
होती हे और किसी ओर बहाव नहीं होता तब और।| 
अधिक हानि होती है। बहता पानी धीरे २ वायु से शुद्ध 
हा जाता है । ५ 
प्रत्येक उपाय करना चाहिये कि जिसमें लाग अपने। 
आसपास की नदियों का जल स्वच्छ रकयें ॥ क्‍ 
(३) तालाव | 
१५. तालावों के शुझ रखने में बड़ी असावधानी की। 
जाती है यद्यपि उनका जल बंधे रहने के कारण शीघ्र बिगड़ 
जाता है। लाग तालाबों में नहाते हैं; दतुअन कुल्ला करते 
और थूकते हें; कपड़े घाते और जूडे बतेन मांजले हैं; किनार 
पर मैलाकर के जल लेते हैं; चापाये और सुअर उनमें लाटले| 
रहते हैं और कमी पाधे मी सिगाने के लिथे उनमें डाल दिये। 
जाते हैं । तथापि उन्हीं तालाबों का जल पीने और भाजन | 
बनाने के काम में लाया जाता है॥ । 
जिन तालाबों का जल गमी की ऋतु में ससख्ख जाता. 
या बहुत घट जाता है वह अत्यन्त रागकारी होता है यदि | 
हो सके ता बस्सी के पास के छाटे २ तालाब, जिनका लाग।| 
छाड़ देते हैं, पाद दिये जायें और कैखी अच्छी बात हो कि।| 
गांव के सब लाग मिलकर पीने के जल के लिये एक बढ़ा | 
गहिरा तालाव खादवावें। मछलियेां और हरे पाथों खे ताला-| 
यों का उपकार होता है परन्तु वृक्ष की पशियां ओर सड्े| 
पौधों से हानि होती है । तालाबों के सलीप कूड़ा न रहना | 
चाहिये नहीं तो पानी बरसने से वह बहकर उनमें चला-। 
जायगा या धरती में समाकर उनमें जा मिलेगा ॥ 


_.. (९९३) है 

यदि हो सके ता ऐसे स्थान पर स्नान करने यख्त्र थाने 
चापायों के लिये एक दूसरा बड़ा तालाब बनाया जावे 
लथापि इस तालाव में भी स्वच्छ जल का होना आशद्यक 
है । मैले जल में धाये हुये कपड़ों से हानि होती है | स्वच्छ 
जल से जन्तओं का बैसाही उपकार होता है जैसा सनन्‍ुष्य 
के । जल बिगडने के कारण चापायों के शरीर में कीड़े पड़ 
जाते हैं ओर दूसरे प्रकार के रोग भी लग जाते हैं ॥ 

जहां नदियां और तालाब हों वहां उनके पास छोटे २ 
कुआं #& खादने से यहुथा स्वच्छ जल मिल सकता है क्यांकि 
घरती के भीतर जल छनकर झड़ हा जाता है ॥ 

(४) कुएं | 

१६. प्रायः वे कुएं उत्तम हाते हैं जिनमें जल बहल गहराई 
से आला है । जिन कुंओं का जल पृथ्वी के ऊपरी भाग के 
कुछ नीचे से आता है वह अच्छे नहीं हाते। प्रायः धरती 
उन मैली कुचेली बस्सआओं से भरी रहती है जा बरसां से 
एकणज्ित हुई हैं और जा जल उस घरती से निकलता है वह 
बिगष्ट जाता है ॥ 

हिन्श्सतान के कुंओं में यह बड़ा दाष है कि उनमें जल 
ऊपर से बहकर जाता है। कहीं २ कुओं में ऊगत नहीं दाती 
परन्तु ऐसे गड़हे रहल हैं जिनसें फेंका हुआ जल बहकर 
जाता है इस कारण कीचड ओर चेापायां का भावबर आदि 
झुओआं में चला जाता है ॥ 

कुओं के ऊषर जगत का हाना आवद्यक है ओर उस 
ऊक आसपास की घुर॒ ती इस प्रकार टरुवाँ हानी चाहिये कि 
जल गिरने पर बाहर की ओर बह जाय | घदि इथें के छाट २ 
दकडे ओर चूना जो जगत के इधर उधर छाल दिये जायें ता 
इससे बड़ा लास होता है । कुंओं पर नहाना थाना न 
चआाहिये। उन पुर धृक्ष की छाया न हानी चाहिये क्यांकि 
































. 
| पत्तियां जल में गिरकर सड़ जाती हैं | कुंओं का झुंह बन्द 
रखने से बड़ा बचाव होता है ॥ 

ट स्वच्छ बतेन और रस्सियां से जल भरना चाहिये। 
कभी २ कुंओं का उगारना भी आवश्यक है जिससे कि 
फूरे घड़े और कूड़ा जा उनमें गिर जाता है निरूल जायथें॥ 
माहरियां और संडास के शैले से विशेष करके हानि। 
पहुंचती है । अनेक प्रकार के बुरे रोग ऐसे जल पीमे से हा 
जाते हैं जिसमें मेोहरियों या सलु॒ष्य के पेट से निकली हुहे 
।सड़ी बस्तु रहता हैं। कुआ के पास के सडास का साव- 
।धागी से स्वच्छ करके बन्द कर देना चाहिये। कुओं के आस 
पास के सब प्रकार के भैले से हानि हाती है । जल से दुननन्‍्ध 
समा जाती है 

३ जल का छानना शादि । 

१७, उत्तम जल निर्मल रहता है जिसमें न स्वाद 
होता है न गन्ध और न किसी प्रकार की सड़नेवाली बस्तु 
रहती है । जब जल में अधिक चूना या काई दूसरे प्रकार 
का खनिज पदाथे रहता है तब उसके मारी कहते हैं ओर 
जब खनिज पदाथ का थाड़ा भाग या झुछ ना नहा रहता 
। तब जल का हलका कहते हैं। 'हलक्ा' जल भाजन बनाने 
और थाने के लिये उत्तम होता है ॥ 

इंग्लिस्तान के बड़े २ नमरों में स्वच्छ जल नला के 
द्वारा सहकां पर बहता है| छिन्दस्तान के कईं नगरों से भी 
अब जल का ऐसाही प्रबन्ध है ओर कुछ काल के पीछे 
(ओर नमभरों में भी हो जाथगा ॥ 

यदि हो सके ता पीने के लिये स्वच्छ जल लाओआ और 
'उसके स्वच्छ रखा । जब स्वच्छु जल न मिले तब बिना 
ओऔटडाये, ठण्ढा किये, और छाने कदापि न पिओ। 
यदि जल औराकर छाना जाय ता और भी अच्छा दागा 


; 








(६ रै८ ) 


छनने तो सहजही में घन सकते हें। बांस था काठ की। 
तिपाहई पर ऊपर नीचे मिद्दी के दा घड़े रक्खा । ऊपरवाले | 
घड़े की पेंदी में एक था दे छेद करदेो और इसके पीछे एक 
परत स्वच्छ बाढ्ू और दूसरा शुद्ध कायले का रक्‍खा । 
[फिर जिस जल का स्वच्छ करना हा उसको धीरे २ घड़े 
में डाल दे जे कोयले और बाल में से निधरकर नीचेवाले घड़े 
में दपषकेंगा। नीचेवाले घड़े का मुंह ढकने से, जिसमें छेद हों, 
बन्द्‌ रक्खा कि जिसमें बाहर के काइ पदार्थ घड़े में न आ पड़ें। 
बाद और कायले का भी कभी २ स्वच्छ करना डेचित है ॥ 
|. पीने के पदाथों में जल अति उत्तम होता है। इस| 
से प्यास बुक जाती है और कोई हानि नहीं हेतती । मादक 
रसे से कूडी प्यास लगती है । जितना अधिक लेग उन्हें 
पीले हैं उतनीही अधिक पीने की इच्छा बढ़ती है । बहुतेरे 
लेग मदिरा पीने से नष्ठ हो जाते हें। उसका न छनाही 
| सबसे उत्तम बात है ॥ 
8. स्वान । 
(१) स्नान की आवश्यकता । 

१८. झारीर से निकस्मी वस्तु सदैव निकला करती हें 
सांस ओर चसे (पसीना ) के द्वारा ॥ क्‍ 

सब नगरों में जा उचित रीति से बने हैं नालियां होती 
हैं। उनके स्वच्छ रखने का उत्तम उपाय यह है कि उनमे से 
जल की धार बहा करे । हमारे चमे सें अनेक ऐसी छोटी २ 
नलियां हैं जिन्हें हम आखोा से नहीं देख सकते एक रुपये 
के नीचे दा हज़ार के लगभग ढक सकती हैं। इन छोटी २ 
नलियां में से सदा जल बहा करता है जिसके साथ| 
निकम्पी बस्तु बाहर निकल जाती हैं । जब हम बहुत परि-| 
| अऋम करते हैं तब परिमाण से अधिक जल निकलकर बूंदों। 
के रूप में चमे के ऊपर एकट्ठा हो जाता है। इसको पसीना े 


( १९ ) 


कहते हैं। एक दिन में प्रत्येक मनुष्य के चमे से इतना जल निक- | 
लता है कि एक शराब की बड़ी बेतल भर जा सकती है। 
और कभी २ इससे भी अधिक निकलता है। जे जल निकलता 
है वह स्वच्छ नहीं होता परन्तु प्रतिदिन उसके साथ आधे 
ताले के लगभग बिषेली निकम्मी बस्तु भी निकल जाती है॥ 

इन छादी २ नलियों के मुह चम के धोने से खुले 
रहते हें मैले से उनके मुंह बन्द हो जाते हैं और निकम्मी 
बसरतु यथाचित रीति से नहीं निकल सकती | इससे खाज।| 
ओर दूसरे प्रकार की बीमारियां प्रायः उत्पन्न होती हैं । 
साबुन से चम अधिक स्वच्छ हो जाता है ॥ 

शरीर से निकली हुई निकम्मी बस्तु कपड़ा, तकिया 
आदि में चिपक जाती हैं । यदि इन बस्तुओं की रगड़ चर्म 
में लग जाय ता चमे के भीतर पैठ जाने से आरोग्यता में 
अन्तर पड़ जाता है। इसलिये कपडे और बिछेानों का भी 
दारीर के समान स्वच्छ रखना चाहिये ॥ 

(२) स्नान करने की रीति ॥ 

१९, निराोगी लागों का, चाहे वे पुरुष हों वा स्त्री, जहां 
तक हो सके प्रतिदिन स्नान करना चाहिये । प्रायः स्नान 
करने के लिये प्रातःकाल का समय उत्तम है परन्तु जिन 
लागों के शरीर काये करने से मैल हो जाते हैं उन्हें सांक का 
स्नान करना चाहिये। भाजन करने के पीछे तुरन्तहीं स्नान 
करना अच्छा नहीं क्थांकि इससे पचाव में बिप्न पड़ता है ॥ 
2 » शनान करने के लिये शुद्ध जल का उपयाग करना 
चाहिये क्योंकि ऐसा अनुमान किया जाता है कि सैले जल 
में स्नान करने से शरीर के भीतर एक प्रकार का कीड़ा 
सभा जाता है। स्नान करने के पीछे दारीर का अंगाछे से 
$अच्छी कूरह पाँंछ डालना चाहिये ॥ 
और. युवा ओर बलवान लोागों के लिये ठण्ढा' जल अच्छा 





























नि ि्मन 0 -) 
'हाला है । ठण्ठे जल में स्नान करने के " यदि दारीर अच्छी 
तरह पांछ डालने पर भी ठण्ठा बना रहे ता इससे यह ज्ञात 
'हाता है कि गरणश जल अच्छा होगा। ज्वर या आँव की 
बीमारी से आरोप्य होने के पीछे लेग तुरन्तही ठण्ढे जल से 
स्नान करने के कारण वहुधा फिर बीमार पड़ जाते हैं । जब 
तक बल भे आचे तब तक गरम जल से काम लेना चाहिये। 
स्नान करने के समय दारीर में ठण्दी वासु लगने से कभी २ 
मल॒ष्य का ज्वर आ जाता है ॥ 

शरीर के धाने से रोगी का सुख होता है। शरीर का 
धाड़ा भाग गरम जल से धाओ उसको धीरे २ मलकर 
पाँछ डाले जिससे वह सूख जाय और तब उसको कपड़े से 
ढांक दो | इस प्रकार दूसरे भागां का भी घाोते जाओ जब 
तक कि सब दारीर स्वच्छ न हो जाथे ॥ 











अकाली लिन निनननन करन तक. फिलासनन-कीत विन कमन्‍++ नमन लगता 


३। उत्तम भेाजन । 


क०-+०»०->«- कर फर सीज-+-ननलण 


१. भेाजन करने का प्रयोजन । 

२०. यदि हम मेन न पायें ता हमारा शरीर दुबंल हो 
जायगा यहां तक कि अन्त में हम मर जायंगे। मांस कहां 
चला जाता है! । पत्थर की सूत्ति का यदि भाजन न मिले 
ता वह दुबंल नहीं होती | इसका कारण यह है कि हम 
काम करते हैं और वह काम नहीं करती । एक हाब्द के 
विलने या एक पग के चलने से हमारे शरीर का कुछ 
भाग घट जाता है। और यह घटी साजन से पूरी होती है ॥ 
देखने से यह जान पड़ता है कि रेलगाड़ी का इज. 
(बहुलसी गाड़ियां का खींचता है ऐसी सामथ्य उसमें कहां 
से आती है। हसके एक बड़ा छुंह होता हे जिसमें पत्थर का 
के।यला था लकड़ियां क्रम क्रम से झांकी जाती हैं अर्थात्‌ इख़न 
कायला खाता है और इसी कारण अपना काम करता है ॥ 








ममरदा के बिना इन न चल सकेगा। जिस बल से तुम 
कास करते हो वह म्तेजन से उत्पन्न होता है। जितना 
बल तुम्हारे दचारीर से निकल जाता है उतनाही फिर भाजन 
से आ जाता है ॥ 

भाजन से कल की प्रापिही नहीं होती किन्तु हमारे शरीर 
में गसी भी उत्पन्न होती है। यह गरी आग के समान 
हमारी छाती के भीतर जला करती है यद्यपि आग के समान 
हसमे लपट नहीं उठती। यदि हम भाजन करें ता हमारा 
शरीर धीरे २ ठण्ढा हो जाता है परन्तु उत्तम लाजन 
हमारे शरीर में गर्मी उत्पन्न होली है। प्रतिदिन शरीर में 
इतनी गर्मी उत्पन्न होती है कि जिससे एक बड़े बतन भर' 
जल औरा जा सक्कता है ॥ 

२. भेजन के पदाथ। 

२१. सारण रखमा चाहिये कि भिन्न २ बसतु के 
खाने से शरीश सें अन्न २ प्रकार का प्रभाय होता है और 
यदि सम्भव हा तो सिन्न २ प्रकार के सेजन करना आहिये। 

भाजन करना इसलिये आवश्यक है कि बाहीर तुर्ब्ठ 
मे हो और बछ और गर्मी बनी रहे। उत्तम मेजन में सरीर। 
का पृष्ठ करनेबाली सब आवश्यक बसस्‍तु मिली रहती हैं । 
यों के दारीर की सब आवश्यकता दध्ही से पूरी होती है। 
जब वे बड़े हाले हैं तब उनका दूसरा माजन दिया जाता है ॥ 

सनुष्य का सुख्य साजन नाना प्रकार के अन्न हैं । 
चावल बहुतही कभ्न बलदायका पएठाथ है। यावल की अपेक्षा 
गहूं याजरा ज्बार से अधिक घल होता है। जे लाग ये अन्न 
खाते हैं वे चावल खानेवाले लोगों से अधिकतर बलवान 
हाते हैं और वहुत परिश्रम कर सकते हैं । चावल में दाल 
मिलाने से अधिक बल हो जाता है. मांस ओर मछली 
दानां से बहुत बल बढ़ता है ॥# के हे 


प्ज्ज्ष्ट 









( २२ ) 


जा लाग विशेष करके चावल, घी और मिठाई खाते 
हैं माटे हो जाते हैं और कठिन परिश्रम करने के याग्य नहीं 
रहते । उनके बाल जवानी में पक जाते हैं और उन्हें बहुतेरे 
रोग लग जाते हैं। ठण्ढे देशां में अधिक गर्मी उत्पन्न करने 
वाले भाजन की आवद्यकता पड़ती है #। गर्मी के सिवाय 
और २ बातों के लिये शरीर में कुछ चिकनई की भी आव- 
इसकता है परन्तु अधिक चिकनई से हानि होती है ॥ 

२२. यधाचित रीति से पक्का हुआ फल उत्तम प्रकार का 
माजन है। परन्तु यदि चह कच्चा हो वा अधिक पक गया हो 
ते उससे हानि होती है | बहुत देर तक रकखे हुये माजन! 
से भी अपकार होता है। किसी प्रकार का सड़ा भाजन 
कदापि न खाना चाहिये॥ 

जलब हैज़ा वा आंबव की बीमारी फैली हो तब 'मेजन | 
में अधिक सावधानी रखनी चाहिये। जिस बस्तु से कदापि 
हानि नहीं होती उस समय वह भी बीमारी और रूत्यु 
का कारण हो सकती है । कच्चे फल और कच्ची तरकारी 
अधिक न खाना चाहिये और सब प्रकार के गरिष्ठ भाजन 
का परित्याग करना उचित है ॥ 

मसाले आदि थाड़ा २ खाने से लाभ होता है परन्तु 
अधिक खाने से आमाइझाय सें हानि पहुंचती है ॥ 

पान खाना, जिसका इस देश में अधिक प्रचार है,| 
दूषित और हानिकारक है| इससे दांत बिगड़ जाते हैं और 
कभी २ नाख्र पड जाता है। इसमें अधिक समय और 
पल कक का व्यथ होता है इस कारण इसको छोड़ना चाहिये ॥ 


| 2० नाइक न ७७०-स्‍क३४७4७७४५७».५क-सानगपदशाइच ५४०७ वाक >>" परिलिकोशकि पर 4. 3. 












4] 


४ मांस में “नाइट्रोजन' मिली हे । यह सक्र प्रकार की “ग्यास्त” दे जा बाय 
में पाई जाती है। यह सर्देव घटती रहती है और इसकी घटती भाजन से प्री छाती 
है #ग्रुदू जार बाजरा मांस और मछली में “नाइट्रेजन” अधिकझ रहती दे । चावल 
में टाहुत धाड्री । तेल में कुछ भी नहों । इमारी हंड्यें मे विशेष करके चना रदता है । 
छूस लिये भाज़न में खानिज्ञ पदायथे अवश्य काना चाहिये॥ .. 

















( २३ ) 

किसी २ अवस्था सें डाक्टर लोग तमाख्‌ पीने की 
सम्मति देते हैं । परन्तु इसका अभ्यास क्रलेने से आरो- 
'ग्यता में प्रायः हानि पहुंचती है । जो द्रव्य इसमें व्यय 
होता है वह दूसरे कासों में उसम रीति से लगाया जा सकता 
है। तमाख्‌ पीने से बालकें के विशेष करके हानि होती 
है। यदि इसका अभ्यास न करोगे लता उसकी अवद्दयकता 
भी न होगी । अफीम खाना वा भांग पीमा अत्यन्त हानि-; 
कारक है ॥ 

यदि भाजन 'भमली भांति न पका हो ता उससे रोग 
उत्पन्न होता है । रसाह के बतन जा ताम्बे था सीसे के होते 
हैं उनके विष से कभी २ लाग बीमार हो जाते हैं । इनका 
स्वच्छ रखना चाहिये और यदि ये बतन ताम्बे के हों ता 
यह बात स्मरण रखना चाहिये कि इनमें समय समय पर 
कलई होती जाय ॥ 

३. भाजन करने की रोति। 

२३. मियल समय पर भाजन करना अति आपवद्धधक् 
है। यदि ऐसा न होगा ता जा भाजन आमाशय में जाता, 
है वह न पचेगा क्योंकि इसको भी दारीर के दूसरे भागों 
के समान नियत समय पर विश्राम करने के छिये अवसर 
(मिलना चाहिये। इसलिये हमका नियल समय पर 'मेजन 
करना चाहिये और आमादशय का एक बार किये हमे 
'माजन के पचाने का अवसर देकर दबारा साजन करणना' 
(वाहिय *॥ 

काम पर जाने के पहिले प्रातःकाल थाड़ा साजन कर 
लेने से शरीर पुष्ठ रहता है और ज्वर नहीं आता। घदि 


जज ५ अननओ-3-ब+४०लनन+- अमन >ननना। --+> - “अटल 











! 





रलनननकन 7 “ला लकला+ २००>-कजन थक 


* प्राज़न के पचने मे प्रायः तोन से पांच घंटे तक लगते दे | काइ ४२ ब्स्स दूसरा 
को अपेत्ना गोत्र पचतोी हैँं। चावल प्राप: रक्त धघंठें में पथ छाता है आर पमांठ 
तीन चेटे में ॥ 


भजन 











( २४ ) 


सम्भव हो तो दोपहर के समय उत्तम गरम भाजन करता 
चाहिये और फिर सांक के सात बजे के लगभग। राजत्रि में 
देर करके माजन न करना चाहियसे। भाजन करने के पीछे 
कुछ देर तक विश्ञाम करना अच्छी बात है ॥ 
संसार में कम भाजन करनेवालोां की अपेक्षा अधिक! 
भाजन करनेवाले बहुत मरते हैं । अमीर प्राय! अधिक 'मेाजन 
करते हैं । गरीब प्रायः थाड़ा खाते हैं । यदि कदाचित इन्हें | 
'भनाजन का अवसर मिला ता थे अधिक भाजन करने फ्के 
कारण बीमार पड़ जाते हैं। हमका उचित है कि अपने आमा- 
शय का कदापि भारी न रक्खें। इससे हमारी हानि होती है ॥ | 
/. निगलने के पहिले भाजन का भली सांति चबाना चाहिये। 
क्योंकि तब यह अधिक पच जाता है और अत्यन्त पुष्रिकारक | 
होता है। भाजन करते समय थेड़ा २ जल पीना चाहिये ॥ 


बल 
3॥ जउसुज्जला ॥ 
जा दृश्ष अन्धरे में लगाये जाते हैं ये सफेद और 


गले रहते हैं। वे सूय्य के प्रकाश में पहुंचने की सदा चेषा 
करते हैं| यही' दशा मनुष्यों की भी है। जे लाग अन्धरे।| 
रहते हैं वे पीले और निबल होते हैं और उन्हें प्राथः। 
अनेक रोग लग जाते हैं । उनका सन भी खिन्न रहता है 
सच ता यह है कि उजेला उपकारक होता है और धूप 
देखने में अच्छी जान पड़ती है । यदि तुम किसी पक्षी का | 
येाल बन्द करना चाहते हो ला पिंजड़े का कपड़े से ढांक दा।। 
पक्षी तभी बालते हैं जब थे आनन्द में रहते हैं और अंधेरे 
में उन्‍हें आनन्द नहीं मिलता। अन्धेरे की अपेक्षा खुले। 
दिन में हम भी अधिक आनन्द होता है। ऐसा जान पड़ता | 
है कि लागां का निरांग होने के पीछ उजेले से भी उनकी 


हात्कि बढती है ॥ 


( २८ ) 

अंधेरा निवास स्थान सदेय बीमारी का घर है यह कह्ा- 
वत प्रसिद्ध है-' जहां प्रकाश नहीं जा सकता वहां डाक्टर 
अवद्य जाता है! । झूथे के प्रकाश से घर की स्वच्छता में 
सहायता मिलती है | इसके द्वारा बस्तुओं का सैलापन भी | 
जान पड़ता है और तभी लेगों का इनके स्वच्छ करने की 
चिन्ता होती है। प्रकाश से सांप ओर कीड़े मकाड़े भाग 
जाते हें। ख्लियों का ऐसे स्थान में जहां उन्हें प्रकाश और 
वायु यथेाचिल रीति से न मिल सके बन्द रखना कैसी बुरी 
ओर ऋर रीति है। इससे उनकी ओर उनके बच्चों की आरो- 
ग्यता में अन्तर पड़ जाता है ॥ 

परन्तु जब प्रकाश खूब हो' तंब कड़ी धूप में रहना 
बीमारी का कारण होता है। प्रायः धूप में दै।ड़ने से बालकों 
के सिर में दद होगे लगसा है। जिन लागें केा खेलों में काम 
करने का अभ्यास होता है उन्हें कदाचित्‌ धूप से हानि न 
हावे परन्तु और लागों का चाहिये कि जब वे दिन के समय 
धूप में निकलें तव अपने सिर की खूब रक्षा रकखें और एक | 
छाता लगाये रहें ॥ 


५ ॥ अनुकूल वस्खर। 


१२५. वायु व जल के अनुसार वस्छ पहिनना चाहिये । 
हिन्दुस्तान के दक्षिण भाग में उचद्ण और ज्ञीतकाल में इतना 
'मेद नहीं होता जितना उस्तरीय भाग में होता है। बद्ाल 
में प्राय! लाग जाड़े के दिनें में इस कारण- मर जाते हैं कि 
उनके पहिनने के कषड़े यधाचित गये नहीं झेसे। दारीर में 
ठण्ढी वायु लगने से उन्हें ज्वर आ जाता है। फलालैन के। 
कुर्ते से बड़ा रक्षा हाती है ! गरीब लेंगे कदाचित्‌ यह साचले 
हों कि हम अनुकूल वस्त्र नहीं साल ले सकते परन्तु बीमार 





अमन मल पर उनका बहुत कुछ उठ जाता है। गहनों की अपेक्षा 
अच्छे बच्ओों में द्ृब्य लगाना चाहिये।॥ 

दरीर के दा भाग बहुत सुकुमार हैं सिर और आँत | | 
अच्छी पगड़ियां वा शाले की दाोपियों से सिर का धूप से 
घचाव होता है| पेट पर कई परत कपड़ा लपेदने से विशेष 
करके रात के समय बीमारी से बचाव होता है। जब ऋतु 
बदलने लगती है तब विद्वेष करके अधिक रक्षा करनी 
चाहिये। गमी के पीछे सर्दी और सदी के पीछे गर्मी के 
दिन आते हैं। सर्दी से प्रायः बीमारी हा जाती है। दुबल 
बालकों का प्रायः सदी हो जाया करती है ॥ 

भारी पगड़ी आदि व्यथ कपड़ों के पहिनने से भी 
हानि होती हे !। 

जा वस्च दिन का पहिने जाते हैं उन्‍हें रात के उतार 
डालना चाहिये। इस प्रकार उनमें जा शरीर का पसीना 
लग जाता है बह 'भलो भांति खूख सकेगा। सब कपड़ों का 
स्वच्छ रखना चाहिये ॥ 

आदे कपड़े पहिनकर बैठना वा साना बहुत हानि- 
कारक शाला है | यदि उसके न बदल सके ता यहलते रहो 
जिसमें थे सुख जायें ॥ 


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६ ॥ व्यायाम अथात्‌ कसरत करना । 


१ कसरत करना 
. २६. कसरत के लाभ का कुछ बणन नीचे किया 
जाता है ॥ 
हमारे शरीर के मोटे २ भाग जिनके द्वारा हम चलते 
फिरत हैं पट्टे कहलाते हें। जब थे उचित रीति पर काम में 
छाथे.जाते हैं तब बड़े और बलवान होते हैं नहीं ता छोटे 





( २७ ) 
और निबंल हो जाते हैँ । किसी लेाहार के दाहिने हाथ के उस 
सनन्‍्यासी के हाथ से मिलान करो जे अपना हाथ ऊपर उठाये 
रहता है यहां तक कि अन्त में बह पतला पड़के खस जाता है।॥ 

जब हम सोते हैं तब एक मिनट में १६ बार सांस 
लेते हें ओर जब दौड़ते हैं लब जल्दी २ सांस लेने लगते हैं| 
जिससे अधिक वायु हमारी सांस के साथ भीतर जाती है| 
इस प्रकार रुधिर का 'मछी भांति शाधन हो जाता है| हृदय 
भी अधिक घड़कने लगता है ओर शरीर के सब भागों में अधिक 
रुधिर जाने लगता है जिससे उनका पाषण होता है ॥ 

कसरत से और प्रकार भी लाभ होता है। ऊब हम 
जल्‍दी २ चलते हें वा अधिक परिश्रम करते हैं तब हमारे।| 
हारीर से पसीना निकलता है | यह वह जल है जा हमारे | 
चम से बाहर आता है जिसके साथ हमारे दारीर के भीतर 
की बुरी बसत निकल जाती हैं और यही आरोग्यता का 
कारण होता है । कसरत के पीछे हम अधिक माजन कर 
सकते और मली भांति पचा सकते हें ॥ 

उचित रीतिशकसरत करने से हमारे शरीर के सव 
भाग बलयथान होते जाते हैं । कसरत न करने से लेग 
आलसी हो जाते हें जिससे थाड़ा भी परिश्रम उनका बास्‍्क् 
जान पडता है। उनका आप आनन्द नहीं मिलता और ८ 
अन्य लोगों का उनसे कुछ काम निकलता है ॥ 

२. कसरत न करना । 

२७. सब जगह बालक खेलना चाहते हें । इससे 
उनका लाभ होता है। कैड़ने, गेंद फेंकने आदि खेला 
उनके हाथ पाँव बलवान हेल्‍ले हैं । चिललाने और हंसने से 
भी उनकी आसशिम्यला बढ़सी है॥ 

काई २ कन्‍लक खेल के मारे अपना पाठ नहों सीखते 
और कोई बहुल कम कसरत करते हैं । बहुतेरी देशी पाठ- 


नर 














कर श्८ ) ___  ( रे ८4)  “___॥_॥_॥&£ 
शालाओं में बालकों के बहुत देर तक रहना पड़ता है वहां 
उनके उठने बैठने का बहुत कम्म अवसर मिलता है। बाल- 
के का चाहिये कि पाठशाला में बैठे रहें और कभी खड़े भी 
रहा करें ॥ 
.. जो युवा पुरुष “थशुनिवखिदी ” अथात विश्वविद्या- 
लथ की परीक्षा के लिये पढ़ते हैं वे कसरत न करने के कारण 
प्रायः धीमार पड़ जाते हैं। उनमें से काश २ यह बिचार 
करते हैं कि हमारा सब समय पढने सें बीतना चाहिये। 
घह उनकी भूल है। कभी ३२ घढ़ई का समय अपने हथियार 
टेने (तेज़ करने ) में व्यतीत होता है । भेजे (दिमाग) के द्वारा 
प्रन काम करता है| कसरत से 'भेजा में अधिक रुधिर पहुं- 
चता हे और वह बलवान होता है। कसी २ ऐसा होता है 
कि जा बालक कसरत पर कुछ ध्यान नहीं दले वे ऐसे बीमार 
पड़ जाते हैं कि परीक्षा में नहीं दे सकते और काएई २ जन्म 
अर इस कारण से बीमार ओर निबल बने रहते हें ॥ 
सांक के समय '“किकेट' अथात गेंद बह्छा का' खेल 
अध्यन्त उपकारक होता है । रस्सी छलाँगने का खेल लड़- 
किया के लिये अच्छा होता है ॥ 

लेखक (माहरिर) लोगों का भी जे दिन भर लिखते 
रहते हैं विद्यार्थियों के समाम कसरत की आवद्यकला है ॥' 
परन्तु खाली पेट या भाजन करने के पीछे कदापि 
कसरत नहीं करनी चाहिये ॥ 


१॥ जींद ॥ 
१. नींद की श्रावश्यकता । 


बिना साथे हम कदापि जी नहीं सकते | धराचीनकाल 
के सो में लागाों के मार डालने की एक बुरी रीति यह थी कि उन 





को सान नहीं देते थे ॥ 


कक. (६ मय8 के >7 











( २९ ) 


जब हम दिनभर परिश्रम करते हैं तब रात का थक 
जाते हैं । खरीर ओर मन दोनों का विश्राम करने की आव- 
इथकता होती है। जा कुछ परिश्रम हम करते हैं उससे शरीर 
सें कुछ न कुछ कम्ती अवदय हा जाती है | विदेष करके यह 
कमी सानेशी से पूरी हेश्ली है। जब लाग किसी कुएं से 
दिनमर जल भरते हैं तब जल घट जाता है परन्तु फिर 
रात के अधिक जल एकट्ठा हो आता है । इसी प्रकार 
रात का 'भली भांति विशज्ञाम करने के पीछे दूसरे दिन 
प्रातःकाल जब हम उठते हैं तनिक भी थकावट नहीं रहती। 
बलवान ओऔर आरोग्य होने के निमित्त हमें नींदभर सोना 
चाहिये ।॥ 





२. नोंद के नियम । 
कभी २ निधेन लोग बहुत कम सोते हैं और धनवान 
लोग बढुधा पलंग पर बहुत देर तक पड़े रहते हैं। युवा 
पुरुषों की अपेक्षा बालकों का अधिक साने की आवद्यकता 
है। बच्चें। का दिन रात में अधिक साना चाहिये। बारह 
बरस के लड़के था लड़की को ९ घंदे के लगभग सोना 
चाहिये ओर मनुष्य का ७ घंटे के लगभग। किसी २ का 
अधिक नींद की आवद्यकता है और किसी का कम्त की ॥ 
साने के लिये रात का समय अति उत्तम है। दस बजे 
रात तक से जाओ ओर प्रातःकाल होतेही उठा । समय पर 
सोने और समय पर उठने से मनुष्य आरोग्य, धनवान और 
बुद्धिमान होता है 
२९. अच्छी नींद आने का' उसम उपाय यह है कि सन॒ुष्य 
दिनभर परिश्रम करता रहे। सोने से थाड़ीशी देर पहिले 
भर पेट 'भाजन न करना चाहिये। ऐसा करने से भनुष्य | 
अचेत से जाता है और बुरे २ स्वप्न देखता है। आमादशय 
के! यहुत परिश्रस कंश्ना पड़ता है और भेजा शान्‍्त नहीं:| 


रहता । स्वप्न ता कल्पित विचार हैं जे मन में उत्पन्न होते 
हैं और जिनका कुछ अथ नहीं हाता। उनपर कुछ ध्यान 
[न देना चाहिथे। उनसे यही सिद्ध होता है कि भेजा का 
(जितना जिशज्ञाश चाहिये उतना नहीं मिला ॥ 

भूमि की अपेक्षा चारपाह पर सोना अच्छा है । यदि 
|सम्मव ही तो भूमि पर कभी न साओ क्थेांकि जब भूमि। 
सूखी होती ओर गांव में ज्वर नहीं रहता तब ता कुछ हानि 
नहीं होती और भूमि गीली रहे तो शरीर में दर्द और 
दूसरी बीमारियां हा जाती हैं । जिस बुरी वायु के कारण।| 
ज्यर उत्पन्न होता है वह धरती के नीचे रहती है और थेाड़ी | 
भी ऊंथी चारपाई रहने से ज्वर नहीं आता है। जे लेाग 
भूमि पर सोते हैं उनका प्रायः सांप जे रात में खाने के| 
खोज में निकला करते हैं काट लिया करते हैं। यदि किसी। 
मनुष्य के पास चारपाई न हो और धरती गीली होवे ते 
उसके उचित है कि घास था सूखी पलियों पर सावे॥ 

इस बात का ऊपर वर्णन हो चुका है कि तकियों 
ओर बचिज्लैानों का रवच्छ रखना चाहिये क्योंकि दारीर से 
निकली हुईं निकम्मी बस्तु उनमें चिपक जाती है जिससे 
हानि होली है ॥ 

३०. रात का बहुतसी निमेल वासु की आवदंधकता 
रहती है । बन्द काठारियों में साने से अत्यन्त हानि होती 
है। घरों के दणणन में इसका बिस्तार पूषक बृतान्त लिखा 
जायगा ॥ 

यहुतेरे लागां की यह बुरी बान होती है कि वे साने के। 
समय सिर का कपडों से खूब टांक लेते हैं । इस कारण शुद्ध 
वायु यथाथित रीसि से भीतर नहीं जाने पाती ॥ द 

कहीं २ गसी की ऋतु में लेग खुले मैदान में सा सकते हैं | 
और उनके हानि नहीं होती । परन्लु जब आस पड़ती है तब 


१७99% 7 ४७४४४ 


खुले मैदान में साने से बड़ी हानि होती है और ज्वर आ जाता 
है। ऐसी दशा में सिर के ऊपर सदा कुछ छाया का रहना 
आवदयक है ॥ 

जहां वायु के भकांके लगते हों वहां सन॒ष्य का सोना 
न चाहिये क्योंकि शारीर से गर्मी निकल जाती है और 
प्रायः बीमारी होती है । जिन दिनों में ज्यर या हैज़ा 
फंला हा ता शारीर का रात के समय गस रखना अलि 
आवद्ययक है ॥ 


आशा आशा 0 ५... 


८। अच्छे घर। 

३१. आराग्यता विद्ेष ररके रहने के घर और उनके 
आसपास की बस्तुओं के आश्लित है। निर्धनी लागों का 
जैसे घर मिल जाते हें बैसेही प्रायः लेने पड़ते हैं । परन्तु 
लन घरों मे एसे उपाय किये जा सकते हैं कि वेही घर 
आरोग्यजनक हो जायें ॥ 


९. चर बनाने की जगह । 

नीची भूमि पर जहां पानी भर जाने का 'भथ रहता 

है घर न घनाना चाहिसे। जहां तक मिल सके ऊंची से ऊंची। 
भूमि पसन्द करो । दलदल के निकट कभी सकान न बनाना | 
चाहिये। सड़ती हुई जड़ली दनस्पतियां से जा बिगही वायु 
निकलती है वह ज्वर का मुख्य कारण होती है। तालाबों 
था नदियों के पास घर बनाना उचिते नहीं । सूस्बी धरती 
पर घरों की कुर्सी धरती से दा तीन फूट ऊंची रहनी चाहिये 
जिससे बरसात के दिनों में उनके आसपास पानी एकट्ठा 

न हो सके ओर न उनमें सील रहे कि जिससे प्रायः पीमारी 
उत्पन्न होती है। गरीबों के भी इस्ती प्रकार अपने घरों की 
कुसी ऊंची रखनी चाहिये। छत का इतना दलुआं रक्‍खें 
जिससे बरसात का जल सहज में निकल जाय ॥ 


__._.. (३२) | 


न्क के इस प्रकार बनाना चाहिसे कि उनमें वायु 

आती जाती रहे। संकरी था येढी गलियों से आरोग्यता का 
हानि पहुंचती है । घरों का पास २ पी गीं बनाना चाहिये ॥ 
कभी लाभ उन घरों का जो बरी जगहों में बने हाते। 
हैं और सस्ते मिल जाया करते हैं लाभ से ले लेते हैं । परन्तु 
अन्त में वे महंगे पड़ते हें क्योंकि किराये में जे बचत होली 
है उससे अधिक द्रव्य दीसारी में उठ जाता है। सीले 
घर से जा हानि पहुंचती हैं वह नीचे लिखी हुईं कथा से 
क्‍ होगी ॥ 





२. सीले चर । 

३२. किसी समय एक रत्री अपनी बहिन से जा गांव 
से कुछ दूर पर रहती थी मिलने गईं । जब उस र्वी ने धर 
के लोगों की क्षेम कुशल पूछी तब उसकी बहिन ने उत्तर 
दिया कि हम लागों का इस घर में अत्यन्त छेश रहता है । 
सेरा पति इतना बीसार है कि उससे चला फिरा नहीं 
जाता । में भी सर्दी (जुकाम ) से पीड़ित रहती हूं । इसके 
उपराम्त पारसाल में हम सब का ज्वर आया था जिससे 
हमार दा धालक मर गये। में इसका कारण नहीं कह सकती 
कि यहां किस दुलाग्य के कारण इतना छलेश है । न जाने 
हम लाग केसी बुरी साइल सें इस घर में आये ॥ 

उस स्त्री ने उत्तर दिया कि हे प्यारी यश्मि हम अभागी 
नहीं हा केवल तुम निबुद्धि हो । तुम्दार धर के छेशें का 
थही कारण है कि तुम दलदल के समीप सीले घर में रहती 
हा । जब तक तुम यहां रहोगी आरोग्यता न हागी॥ 

उसकी बहिन ने कहा क्या सचमुच यही बात है ! थदि 
तुम्हारा कहना सत्य है ता हम लोग इस घर का कल ही 
छाड़ देवेंगे । परन्तु कहीं भी हम लेाग जायें आपत्तिही में 
रहेंगे। जे भाग्य में लिखा है उसको! कान सेट सकता है ॥ | हे ॥ 


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( रे३ ) 


उस बुडिमती स्री ने उत्तर दिया कि निस्संदेह हम पर 
आपदा सब जगह आ सकती है । परन्तु हमें उचित है कि 
नासममी के कारण अपने ऊपर काहे आपदा न आने 
देवें । तुम्हारे घर भर की विपशियों का यही कारण है तुमने 
/आराग्यता की यथायित सावधानी नहीं की ॥ 

बहुत भांति से समझा बुकाकर वह स्त्री अपनी बहिन 
का सकुटुम्ब -बहां से दूसरे घर में, जे अच्छी जगह पर था, 
लेगई और वहां आरोग्यतफ बहुत अच्छी रही ॥ 

३: वायु का संचार । 

३३. घर में आरोाग्यता के निर्मित प्रथम आवद्यक 
यात यह है कि शुद्ध वाजु यथेष मिले। बारिकीं (सेना के 
सिपाहियों के रहने के घर ) या कैदखानों में प्रत्येक मन॒ष्य 
के लिये स्थान सावधानी से नियत किया गया है। जहां तक 
बनपड़े प्रत्येक मन॒ष्य के लिये ८ फट लम्बा और ६ फुट 
चैड़ा अथात्‌ ४८ वगात्मक फुट स्थान होना चाहिये । अधिक 

मनुष्यों का एक स्थान में न रहना चाहिये क्योंकि जिख 
स्थान में अधिक भीड़ रहती है वहां लोग उस खान की 
अपेक्षा दूने मरते हें जहां कि यथेष्र छझुद्ध वायु मिलती है ॥ 
जिस भांति वायु कम या अधिक आती हो उसझे 
अनुसार रहने का स्थान बनाना चाहिये। जिसमे यायु का 
संचार नहीं होता उस बड़ी काठरी की अपेक्षा छादी 
काठरी में जहां कि वायु का संचार 'नली 'मांसि हो मससुष्य 
निराोग रह सकता है। बहुतेरे कापड़ों में मीत की द्राशों 
और छप्पर के मरोखों सें से वायु भीतर और बाहर खूब 
आया जाया करती है ॥ 
विशेष करके इंद और चूने के बने घरों में शुद्ध वायु की 
अधिक आवद्यकता जान पड़ती हे । ऐसे घरों में छोटी २ 
कुछ खिडिक्ियां होती हें जे! रात का सावधानी से बन्द 


“्यह- #पुपम्पीयारितक+अ ००९... कप 











( ३४ ) _  । | 


कर दी जाती हैं । किसी २ काठरी में खिड़िकियां नहों 
| रहती केयण एक छोाठासा द्वार रहता है। इसलिये वायु 
जा घर के भीतर सामेबालें के कारण बिग जाती है 
बाहर किसी उपाय से नहीं निकल सकती परन्तु छठस घर 
में भरी रहती है ।॥! 

जिन काठरियों म॑ केग साते हैं उसप्त सिन्न २ प्रकार 
के सामान था खाने वी बस्त रबर्ली रहती हों। यह दसी 
बुरी चाल पड़ गए है कि जिशसे अत्यन्त हानि होती है! 
इससे बौर भी कम वाशु भीतर आती है ॥ 

३४. यदि रहने की काठरियों में आरा था ; | 
|चायु और छुआँ शिकल जाने का काई दूसरा मागे न हो 
ला उनमें आग न ऊलानी चाहिये। दिया से वाय उतनी ही 





4क-> आर ऋण] 


[ 


> “22: दा 28 | 


(बिगड़ जाती है जितनी जन्लुओं से ॥ 
साने या बंठने की काटरी में कम से कम दो शिड्ि 
किया वाय के आने जाने के लिये आमने साइटने होनी 
चाहियें। केवल एकटी खिड़की के रहने से वायु का यद 
संवार सहीं होता ॥ 
जेसे धुआँ आग से निकलता है उसी प्रकार वास खाद 
[के साथ बाहर निकछती है। छत या छप्पर के समीप वास 
के निकलने के लिगे गाल होना आहिसे। खिल|शिखादार । 
खिडिकियां से यह काम निकल सकता दे । द्वार दी बम | 
पैसे कुछ चाय समीलर आ सझती हे | परन्‍त नीपे रू छे।६ २ । 
छदी के छाया अधिक वास मोतर भा सऊगी ॥ 

ठरी के भीतर रहने के कारण प्रायः छोाग मई! 
'जानत हैं कि वायु कब बिगड़ जाती हे। जब छागे की अल 
का विष असर कर जाला है तब उनके ऐसी मींद आदी 
फेर वे कभी नहीं आशते।| यही शाल “ करधेनिक एसिप्ड 
यास से सी हावी 8 | जिनकी सांस के साल मह गया 


7. पा +हआइ अ2०4०काकज्यने- प्रकट 2. 



















( ४५ ) 


भीतर चली जाती है वे छाग अधेत हा जाते हैं। किसी 
केाठरी में येष शुद्ध वायु होने की एक जांच यह हे कि। 
कई मलुप्प उसके भीतर जावे और यदि उसे वहां किसी 
प्रकार दी गन्ध आधे ता वायु दिगड़ी जाने क्यांकि शुद्ध 
वायु में किसी प्रकार की गन्ध नहीं हाती ॥ क्‍ 

जहां फेवल स्कियां रहती हो बहां की काठरी बडी हो 
ओर उनमें वायु उभर उजेला यथेय्र होना चाहिये ॥ 
द ४. घरों की सफाई । 


54 


6 


३५. घरों का व से कमर से कम दे बार चूने से पुतवाना 
चाहिये। चूने की पुताश से घर खूब स्वच्छ हा जाता है। भिद्दी | 
की भीतों और घरों की घरती छकेा आउवें दिन सिद्दी से 
लीपना चाहिये परन्तु उसमें गाजर का मिझछाना उचित नहीं || 
गीली मिट्टी की अपेक्षा खूखी मिड्दी से बहुत कम हानि 
दाती है। कमरों और वरामदें में सावधानी से प्रतिदिन | 

भा देवा चाहिये परन्तु प्रतिदिन घोने से इनमें सील हो 


४ ' 


५१ ५ 


जाती है और इससे हामि पहुंचती है ॥ 


५ घर का दकूड़ा ॥ 
केले के छिलके ओर दूसरे प्रकार का कूड़ा घर के पास 
कदापि न फेंकना चाहिये। जब इनका तुरन्त उठवाना अस-| 
मय हो तब उलसस उपाय यह है कि एक मिद्दी के बतन सें।| 
डालकर उसका सुह ढकने से खूब बन्द कर दा । दिनभर क 
कूड़ा उस यतन में एकद्ठा होता रहे और दूखरे दिन प्रातः 
काल उसे खाली कर डाले । काह २ नगरों में कूड़ा करकटद 
उठा लेजाने के लिये गाड़ियां रहती हैं । जहां यद्द प्रबन्ध 
नहीं है वहाँ उचित यह है कि घर से कुछ दूर किसी 
गड़दे में कूड़ा फेंकवा दिया जाय । घर से जिलमी दूर कूड़ा 
डाला जायगा उतनीही थाड़ी हानि उससे होगी । परन्तु 
'बहुतेरे लोग अपने बार के पास गड़हे स्वेदकर उनमें कूड़ा 


( श६ ). 


डाला करते हैं यहां चह सड़ा करता है। ये गड़हे वे इस 
अभिषपाय से खादलते हें कि जब कभी उन्हें कूड़ा फ्रेंकना हो 
। लव उनको दूर न जाना पड़े । उन्हें दगन्ध का ऐसा अभ्यास 
पड़ जाता है कि ये उसपर कुछ भी ध्यान नहीं देते हैं । परन्तु 
इस अभ्यास से कुछ दृगन्ध की हानि नहीं मिट जाती ॥ 
क्‍ यदि हो सके ता रसाई का जल वहीं न मरने पावे 
क्यांकि उससे वायु बिगड़ जाती है ॥ 

विष्ञा की दुगन्ध दूर करने का सहज उपाय यह है कि 
उसपर थाड़ीसी रूखी मिद्दी डाल दी जावे जिससे दुर्गन्‍्ध 
।दव जाती है क्योंकि जे। घसलु सल॒ष्य के लिये हानिकारक 
हि वह सिद्दी में समा जाती है जेसे कपडे में जल ॥ 

किसी २ देश में किसान लाग विष्ा का खाद समझकर | 
उसकी बड़ी चाह करते हैं और इस देश में लोग बहुधघा 
खेलों में गाबर डालते हें। इस देश में बहुतेरे किसान विषा 
का अपविज्न मान उसे काम में नहीं लाते। घरों के पास विषा 
रखना ता असिही बुरी वात है क्योंकि उसकी दुगन्ध उन 
किसानों और उनके बालबच्चों के शरीर में समा जाती है। 
जब विड़ा खाद के समान काम में लाया जाता है तब मिद्दी 
में मिलने से वह शुद्ध हो जाता है और इससे धरती की 
उपज बढ़ जाती है ॥ 
। सूखा कूड़ा जला देना अहिधे क्योंकि उसकी राख से 
(अच्छी खाद बबली है जे मिद्दी के समान दुगन्ध दूर कर 
देती है ॥ 





६. चर के आसयास की बस्त । 
४९६. यादि सम्भव हो तो घर के चारों आर खुला 
| रखना चाहिये। छाथे के लिये थाड़े से वृक्ष रहें परन्तु इतने 
नहीं कि शुद्ध वायु रुक जाथ। घरों के पास छोटे २ वृक्षों का 


( ३७ ) 


अंगल न रहना चाहियपे। उनसे जा पश्ियां गिरें उन्हें काठ 
कर बाहर किसी गड़हे में फ्रेंकना या जलां देना उचित है ॥ 
घर में चापायों, बकरियें या घेड़ों का थान न बनाना 
चाहिये। उसके सांस लेने और उनके मैले से वायु बिगड़ 
जाती है। यदि वे पासही बांधे जायें ता इस बाल पर बड़ा | 
ध्यान रक्सखा कि मेला हटा दिया जाथा करे | खाद का ढेर 
घर से कम से कम से गज़ की दूरी पर होना चाहिये ॥ 
जहां की घरती दलुआँ हाती है वहां का जल तुरन्त 
यह जाता है। थघदि घरती नीची रहती है ता बरसने के बाद 
पानी एकड़ा होकर सील और सर्दी उत्पन्न करता है। फिर 
| सूय्य की गसी से छोटे २ गलहे सूख जाते हें परन्लु उनमें 
की सड़ी हुई बस्तुओं से ऐसी दुर्गन्ध निकलती है जिस 
से अत्यन्त हानि हातली है । जिन गडहों में जल एकड्ठा होता 
हो उनके पाट देना चाहिये। बरसात के दिनों में जल यह 
जाने के लिये नालियां बनाई जाबें और कभी २ साफ़ कर 
डाली जाया करें॥ 
दुलदल था भझाबर से ज्वर उत्पन्न होता है | नालियों के 
बनाने और भूमि का जात डालने से यह दाष मिद जाता है। 
जहां ये उपाय नहीं हो सकते वहां बहुत से वक्ष दलदलें और 
घरों के बीच में लगा देने से ज्वर उत्पन्न करनवाली बुरी वायु 
।(मेलारिया ) दूर हो जाती है ॥ ह 


€. नगर जार गांव की सफाई । 


२७. हिन्दुश्सान के बहुत से नगरों में सफाई के अधि-| 
कारी अथात अफ्सर नियुक्त रहते हैं और गांजेर में पह कास 
प्रधान के अधीन रहता है। इन लोगों का झुखूय कास यह 
होना चाहिये कि लोगों की आराग्यता पर ध्यान रक्‍्खें।। 
।अपनीही भलाई के लिये अमीरों का उचित है कि गरीबों 





( रेट ) 


की रक्षा किया करें। जेसे किसी घर में आग लगने से वह गांय 
भर सें फैल जाती है ऐसीही अवस्था बीमारी की ऊानो ॥ 
प्रत्येक श्रतुष्य के लिये सब से सुगम और शीघ्र उपाय 

नगर के सा रखने का यह है कि वह अपना घर और उस 
का हाता साफ रकक्‍्खे | परन्तु काईं २ काम ऐसे हैं कि जा 
विशेष करके अधिकारियों से सम्बन्ध रखते हैं ॥ 

बाजारों की देख माल अवश्य होना चाहिये जिसमें 
कि वहां सड़ा घुना नाज और सड़ी हुईं तरकारियां था 
सड़ा सांस न बिकने पावे ॥ 

पीने के लिये अच्छा जछ मिलने का प्रबन्ध होनो 'बाट्टिये 
तालाव और उनके आसपास की ऊगह साफ रखनी चाहिये 

शरीर से निकली छुट्ट बुरी बस्तु ओर रसाई के घर 
के जल आदि से नाछियों में मेला एकट्ठा हे जाता है। इंड्लि- 
स्तान के बड़े २ नगरों में भैला घरों के नें में होकर बड़ी 
गहिरी नालियों के दारा दूर बट जाता है। यही उपाय कुछ ९ 
हलक में किया गया है परन्तु इसमें बड़ा खच पड़ता है और 
हिन्दुस्वान के कई झागों में जालियों के साफ झरने के लिये 
यथेषु जल मी नहीं शिलता । यदि अच्छी चिकनी मिद्दी के 
गल बनाये जझार्थ तो इस प्रकार से हिन्दुस्तान के और २ 
सगरों का सैलापन दूर हो जाय और अधिक ख़्चे भी न पड़े 
परम्तु आज कल दूसरे उपाय करना उचित है ॥ 

ह उचित है कि जहां अच्छी जगह भिले वहां सर्ये 
सावारण के छिपे पायसख़ाने वनवाकर साफ रक्‍्खे जायें ।| 
सखी मिद्दी के डालने से दुगनन्‍्ध जाली रहती है। प्रतिदिन 
मैला निकलवाकर गांव से कुछ दूर पर ऊसरभूमि में गड़वा 
देना चाडहिये॥ 

इस बात का ध्यान रखना झाहिसे कि गलियां का 
कूड़ा' एक जगह एकट्ठा करके उसे वहां जला देना या द 




















( ३९ ) 


खाद्‌ के ढेर में मिला देना चाहिये। जिस ओर से बायु। 
का संचार न हो उसी ओर कूडा फेंकना उचित है ॥ 

बरसाती जल बह जाने के लिये नालियां होनी चाहिये।। 
खुली हुई छिछिएी नालियां सहज में साफ दे! सकती हैं । 
'नगरों सें नहरें पक्की बनानी चाहिये नहीं तो जल प्ृम्ति में 
सार जायगा। नहरों का सैला बहकर वहां नहीं गिरना 
चाहिये जहां से पीने का जल छिया जाता हो नहीं ला वह 
बविगछ जाथणगा ॥ 

जहां तक दो सह्े टेढी गलियां शीधी करदी जायें | 

एके वायु बेशाक चला करे। खुल चाराहे, नगर के उपवन 
और बागीचे अत्यन्त उपकारक होते हैं ॥ 

समार और रंगरेज़ एगर के बाहर था ऐसे स्थान पर 
अपया काम दाशये पहडें महा कि लोग का आना जाना कस 
होता हा | इसाह्लाने साए रहने चाहिये ॥ 

जा जन्तु खाने के लिये नहीं मारे जाते उनकी लोधथें 
सड़ने के पहिलेही हटाकर गांव से छुछ दूर पर गड़वा देनी 
चाहिये | छुदीं के गाड़ने और जलाने की जगह परों के 
पास न होवे। क़न्न कम्म झे कम पांच फुट गहरी खादी जाय 
ओर उसपर बहुतसी मिट्टी डाल दी जाय ॥ 

१०। खोलारोी। 

३९. गई आरोर्य्ता फिर पाने की अपेक्षा आरोग्थ | 
'बने रहने का उपाय सहज है। फहावत- है कि औषाधि करने 
की अपेक्षा रोग का रोकना अच्छा शेला है । यद्यथि थीभार 
पड़ने पर अन्त में हम अच्छे हो। जाते हैं लथाएपि बीसार पड़ने 
से आरोग्य रहना बहुतह्ली अच्छी बाल है ॥ क्‍ 

का ३ २ मनुष्य ऐसे सूख छाले हैं कि बीसारी रोकने के 
लिये आरोाग्यता की दशा में रेचक अथःत्‌ दस्तावर औषधि 

















( ४० ) 


सवा लेते हैं। घह केवल व्यथ्थंही नहीं किन्तु हानिकारक है 
क्योंकि इससे शरीर निबेल हो जाता है। हैज़े के दिनों में 
ले ऐसी औषधियों के खाने से हानि होने का भी 'भथ 
रहता है ॥ द 

जब हैज़ा हो जाथ तब तुरन्त औषधि खानी चाहिये 
परन्तु बहुतसी छाोदी२र बीमारियां विश््ाम और उचित 
।माोजन करने से जाती रहती हैं ॥ 

जब मनुष्य का बीमारी के चिम्ह जान पड़ें तथ उचित 
है कि वह काम छोड़कर विशज्ञाम करे और क्षपने छारीर 
के। गरम रकखे और नित्य के साजन के बदले हलका 
'साजन करे । इन उपायों से अवदय आराप्यता प्राप्त हो 
(सकती है। विज्ञाम करना और हितकारी 'भाजन खाना 
बयाही उत्तम बात है ॥ 

दइागियों की सेवा । 

४०. प्रायः थथेयित देखभाल न होने के कारण बहु- 
तेरे रोगी मर जाते हैं । कुछ सूचना नीचे लिखी जाती हैं ॥ 

(अ) वायु स्वच्छ और लाज़ी रखनी चाहिये- 
बीसारी की दशा से इसकी दूनी आवश्यकता रहती है। 
रोगियों के शरीर से बहुतसी दुरी बस्लु निकला करती हैं 
जिनमें से बहुधा दुरगेन्‍्ध आया करती हें। कभी २ रोगी के 
छोटी ओठरी में बन्द कर देते हें जिसकी बायु बहुत लागों के 
आने जाने से और भी दिगड़ जाती है। श्सस रोगी का 
और उन लोगों का भी मे सीतर जाले हैं हानि पहुंचती है॥ 

(थघ) स्वच्छता पर विश्वेष करके ध्यान देना चाहिये 
जिन बस्तुओं से दुर्गेन्ध निकलती हाबे तुरन्त हटा दी जायें । 
| यदि रोमी बहुत बीमार न हो तो उसका हारीर प्रतिदिन 
कुनकुने जल में कपड़ा भिगाकर धीरे २ पोंछ डालना 
घाहिये | 





( डरे ) 


क्‍ (स) भाजन में सावधानी रखनी चाहिये। बीमार पड़ते 
ही सबसे अच्छी बात यह होगी कि रोगी एक था दे बार 
भाजन न करे । परन्तु यदि बीमारी बनी रहे तो इडारीर में 
" यने रहने का उपाय करना भी आवद्यक है। कभी २ 
रोगी भूख के मारे मर जाते हैं। परन्तु जब रोगी बहुत निर्वल 
हा तब सांड के समान हलका भाजन दिया जाय। थाड़ा 
करके कई घार साजन देना चाहिये॥ 

(द) चुपचाप रहा और दया का बताव रक्‍्खा । रोगी 
का चिलाने से बेचेनी होती है। उन्हें चुपचाप रहने दा 
और इच्छानुसार साने दे। । उनसे अच्छे मन से बाले और | 
उनकी प्रसन्न रक्खा ॥ 

१. साधारण बीमारियां । 

४१. बड़े दिया की अपेक्षा छोटा दिया तुरन्त बुक। 
जाता है । बालक प्राथः उन बीमारियों से मर जाते हैं जिन 
से बड़े बूढ़े नहीं मरते । उन्हें विशेष करके झुद्ध वायु निमल, 
जल हितकारीभाजन और गर्मी की आवश्यकता रहती है ॥ 

यर्चों का सबसे उत्तम भाजन दूध है। दांत निकलने 
के बाद उन्हें मांड, खूब गला हुआ भात और २ दूसरे प्रकार 
के साजन क्रम क्रम से देना चाहिये। दांत निकलने के समय 
घड़ी सावधानी करनी चाहिये | धूप, गम वायु और सदी से 
बच्चों के बचाना उचित है ओर सब बच्चों के टीका लगवाना 
आवद्यक है | दांत निकलने के पहिले जब बच्चे लगमग तीन 
परहीन के है| तब टीका लगाना उचित है ॥ 

ब॒रे साजन से बालकों का हानि पहुंचती है। थे नहीं 
जानते फि कै नसी बस्तु बुरी होती है इसलिये प्रायः कच्चे फल 
कश्े चने आदि खा लेते हैं। इसलिये उन्हें दस्त आने लगतें| 
और आंब आदि की बीमारी हो जाती है। भाजन में साव- 
घानी रखने से हज़ारों बच्चों के प्राण हरसाल बच सकत हैं ॥ 






























( ४२ ) 

बचचों का स्वच्छता का अभ्यास कराना चाहिये । इस 
से खाज और दूखरी बीमारियां नहीं होतीं । 

जब ओस पड़ती हो तब बच्चों का खुले मैदान सें न 
सामने पायें । उनका शरीर गम रखने के लिथे रात के समय 
खूब कपड़े पहिना देना चाहिये । बच्चों की बीमारी और 
सत्यु का सुख्य कारण सदी है ॥ 

(१) ज्वर | 

४२. हिन्दुस्तान में लोग बहुधा ज्वर से मरते हैं चाहे 
यह प्रतिदिन आये चाह ऊनन्‍्तर देकर ॥ 

प्रायः ज्वर के आने का मुख्य कारण एक प्रकार की 
बिषेली बिगड़ी वायु जिसके (अद्गरेजी माषा में) मलेरिया 
कहते हैं होती है । मलेरिया का हाल अमी सक पूरा २ 
जाना गया है। यह विजदेी वायु विशेष करके दलदलेां 
ओर घने जहूला में जा पवत की तराहइ सें होते हैं और 
उन रेतीले और ऊसर जिलों में भी जहां मीचे की धरती में 
सील बनी रहती है उत्पन्न होती है। सडनेवाडी बमस्पशियां 
के भूमिपश सूझ्कने से भी घह जियेली वाय उत्पन्न होती है । 
ऐला अलुधान किया जाता है कि 'पलेरिया” एक प्रकार 
वी साफ है जे वायु में जा मिलती है परग्तु सामाम्य 
वायु से कुछ भारी हातली है । बरसाव के बाद उब घरती 
सूस्वन लगती हे तब यह साफ बहुसायत से उत्पन्न होती 
है रात का इस भाफ से वड़ा मय रहता है। जठ से वह 
सभा जाती है और बिशेष करके इस रीति से उसका बिष 
शरीर के भीतर चला जाता है ॥ 
/ यह कह चुके हैं कि किसी समय हग्लिस्तान में लाणों 
के बहुत ज्वर आता था इसके दूर फरने के लिये जा २ सुख्य 
उपाय किये गये थे ये थे कि दलदल पाली घनाऋर साफ 
कर दिये गधे और छलागों का शुरू जल मिलने लगा । इस 


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( डेऐे ) 


देश भें भी इन्हीं उपायों से बेसाही लाम हो सकता है। 
रोगी का हलका और पृष्ठ माजन देकर उसका बल बनाये 
रब्तना चाहिथे। चढक्के होने पर शीघ्रही था बहुत देर तक 
टपढे जल में महाने से प्राथः ज्वर फिर आने लगता है॥ 
क्‍ ४३. ज्वर की उत्तम औषधि जो अभी तक जानी गई | 
है वह एक सफेद रड़् की बुकनी है जिसे ( अक्वरेजी भाषा में ) 
“क्विनाइन कहते हैं और वह एक वृक्ष की छाल से बनाहे 
जाती है | यह आऔषधि बहुत मकछंगी मिलती है, परन्तु सर- 
कार की आज्ञा से इसके वृक्ष इस देश में लगाये गये हैं इस 
लिये धीरे २ वैसीही “'क्िनाइन” इन वृक्षों से बमाई। 
जावेगी ओर सस्ती भी हा जायगी ॥ 

ज्यर से बचने के लिये नीचे लिखे नियमसें पर ध्यान 
रखता चाहिये ॥ 
|. घरों के चारों ओर इतने घने पेड़ और काड़ियां न 
होना चाहिये कि जिनसे उजेला और वायु रुक जाय । मैली 
बस्तु निकट न रहने पाये ओर भूमि पर पानी बह जाने के 
लिये मसाहरियां यनाई जावें। जल का बड़ा ध्यान रखना 
चाहिये। जब अच्छा जल न मिल सके तब पीने के पहिदे 
उसे ओऔरटकर छान लेना चाहिये। 

जब ज्वर फैला हो तब बिना कुछ खाये सवेरे बाहर 
घत जाओ और पेटमर अच्छा भाजन किया करो । दिझ 
का धूप और अधिक परिश्रम से और रात का ओआस 
और ठण्दी वायु से बचे रहो । खुले भैदान में न सोओः || 
नित्य की अपेक्षा अधिक गर्म कषड़ा पहिया । विशेष करके 
रात के समय दारीर गम रखा । अठारी पर न सा सं: 
ला चारपाई पश अवदय साओ ॥ 

ऐसा अनुमान करते हें कि जल के पीने था सांस 
के साथ दुर्गन्धि के भीतर जाने से बहुतही बुरे प्रकार का 











( डेंढे ) 


स्वर आने लगता है। कमी २ यह दिष संडासां के दारा 

एं में जा पछुंचला है । इसका स्मरण आतलेषी रुंगटे रू 

दवा जाते हैं । इसलिये स्वच्छत्षा अति आवश्यक है ॥ 
(२) संग्रहणी और अतिसार । 

४७. संग्रहणी प्रायः विकारी था अत्िकि भाजन करने 
से तथा दूषित जल पीने से हाती है। एकाएकी ऋतु के 
और कपड़ों का बदलने से भी यह बीमारी हा जाती है 
घुपचाष पड़े रहने और केवल मांड़ के और कुछ न खाने से 
प्रायः यह बीसारी जाती रहती है 

अतिसार एक दूसरे प्रकार का असाध्य रोग है जा 
आंतों में हो जाता है। इसमें आंतों के नीचे के भागों में 
सरोड़ उठती है और आंबव और खून के दस्त आने लगते 
हैं। इसके भी कारण चही हैं जा संग्रहणी के होते हें । 

बहुलेरे लोग अनुमान करते हैं कि “मलेरिया ” से भी 
संग्ररणी हो जाती है । यह रोम अति भयनाक है और इस 
का दूर करना बहुत कठिन है । इसलिये किसी अच्छे 
डाक्टर की सहायता अवद्य लेनी चाहिये। चंगे होने पर 
भी भाजन में दिलोष सावधानी रखनी उचित हे जिसमें 
कि यह बीसारी फिर ने लाट आचे ॥ 

जिन २ उपायों से सन॒ष्य ज्वर से बचता है उन 
उपायों से अतिसार या संग्रहणी भी रुक जाती है। मेाजन 
में विदाध सावधान होगा चाहिये। कच्चे या गछे फल 
और कचली तरद्ारियां और चह लाजन ओर पच न खर्के न 
ऊआाझ चाहशिये। विशेष करके रात के समय अधिक साजन 
का परित्याग करमा उचित है । दहारीर के गस रख्ना 
चाहिये। जहाँ बाथ असि देग से चलती हो बड़ा न खाओ | 
आंतों भे चारु छगमे से अत्यन्त हानि पहुंचनी है। ऋतओंं 
के बदलने के समय बड़ी सावधानी रखना चाहिये। गसी 
या सर्दी से अल्झिर ढोजाने का भय रहता ह ॥ 












( ४५ ) 


(३) विश्वचिका अथात हैज़ा । 

४५. घह बढ़ा मथानक रोग है। यदि दा मन॒ष्य बीमार 
पड़े ता प्राथः एक मर जाता है। “ प्रलेरिया ”” के समान 
इसका भी कारण अभी तक ठीक २ नहीं जाना गया है 
परन्तु जिन उपायों से हैज़ा प्रायः रुक जाता है दे अली 
भांति जाने गये हें ॥ 

वाघु में पाधां के बहुत छोटे २ बीज जिन्हें । जड़ा 
लाती है मिले रहते हैं । यदि थे बीज सीली और अनुकूल 
भूमि पर गिरें ता जम जाते हैं और यदि भूमि अच्छी नहीं 
होती ला नहीं जमते | अब अच्छे २ डाक्टरों की यही 
अनुमति है कि जैसे छोटे २ बीजों से पाघे भूमि पर उत्पन्न 
होते हैं वेसेही हमारे शरीर में बीमारियां उत्पन्न होजाती 
हैं । शीतला की थीमारी में रोगो के शरीर से ऐसे बीज 
असंख्य निकलते हैं ॥ 

मैलेपन, अहित भोजन ओर रात को वायु में रहने 
से थे भमयकहूर बीज हमारे झरीर में जम जाते हैं | स्वच्छता, 
हितकारी मभेजन, गम कपड़ों और घलकारक पदाथ से ये 
बीज नहीं उगने पाते ॥ 

लेग अनुमान करत हैं कि हेज़े के बिबैले बीज विद्येष 
करके जल में जा मिलते हें |-जिन मज़ुष्यां का हैज़े की बीमारी 
हो जाती है उनके शरीर से निकली हुई बुरी बस्तु कुओं 
में समा जाती है और प्रायः ऐसा हुआ है कि उन्हीं लेगों 
का हैज़ा छुआ है जिन्हों ने उन कुंआं का जल'पिया ॥ 

जब हेज़ा फेला हा तब करों का चूना से पुतबाना 
चाहिये और स्वच्छता पर विशज्वेष ध्यान रखना उचित है । 
इस बात्त की भी विशेष आवद्यकता है कि पानी पीमे था 
रसाई के काम में लाने के पहिले जल के औटाकर ठण्ढा किया 
जाय और फिर हाोसके तो छान लिया जाय | इत्स उपाय 


सीरितीक ते ६*०्य 




















( ढदेंपे ) 


से प्रायः हेड़े से हानि नहीं होली। अति गरिछ मान 
न करना चाहिसे। आमाशय ओर पेट पर फलालैन दी 
पही बांवने से विशेष करके रात के समधथ बड़ा बयाव 
होता है। थिमा डाक्टर की अधुमति के कदापि दस्तावर। 
दवाई न खकआा ॥ 

रर से मरुष्य का हेज़ा होने की संभावना बढ़ जाती 
है । विशेष करके पीने और रसाई बनाने के छिये निर्मल 
जल मिलने का उचित उपाय करा और तब परसेश्दर पर 
भरोसा करके निरमेघ रहो ॥ 
४६. हैज़े में प्रायः पहिले दस्त आते हैं। इसके पीछे 
के होती है ओऔर हाथ पांव ऐंठने लगते हैं। हातेही उपाय 

रने से यह बीमारी प्रायः अच्छी हो जाती है परन्तु यदि। 

इस रोग की कुछ देर तक औषधि न की जाय तो प्राय: 
दवाई नहीं काती । ऊब हेज़ा फैला हो तब घर में हैज़े की 
दवाई रक्खा ओर ज्याोंही किसी सल॒दुय का यह वीमारी हो 
व्योंही उसे दवाशे देकर आराम से लेटा रहने दो । उसका 
हारीर कपड़े से ढांक दे। कि जिसमें गम रहे | ठण्ढा पानी 
थाड़ा २ पिलाओ जिससे उपकार होगा । अच्छे हाक्टर 
के तुरन्त चुलाओ ॥ 

जिन लेगों को हैज़ा हो उनका मल सूत्र धरती में 
घहुतही नीचे गड़वा दिया जाथ जिससे वायु था जल न 
बिगड़े । बिछेने और कपड़े था तो जला दिये जायें था 
गन्घक का चआ दंकर था डाल हाय ॥ द 

ऊिस जगह पर किसी भशष्य को यह बीमारी हो 
जाती है वह भयानक ब्यन पहली है। जिस घर में होवे।| 
थदि हा सके तो १० दिन के छिब्रे छेछ देव। चाहिये। यंदि 
बस घर का फशो कबा है। ता खादकर फिर से बनाया 
जाय और कमरों में रहने के याहिले भन्‍्धक जलाई जाय ॥ 








( ४७ ) 





इस देह के बहुतेरे भागों में सुख लोग समफते हैं कि 
हेज़ा भूलां के कारण होता मे । इसलिये उनके प्रसन्न करने के 
लिये मांख और पूजा आदि रात भर करले हें। इस प्रकार रात 
का वायु में रहने और थक जाने से प्रायः बीमारी और बढ़ 
जाती है। सदैय इस बात का झरण रक्खा कि हैज़ा स्वच्छता 
पर न ध्यान देने और निभल पानी के न शिलने से होता है और 
भूतों | कारण जिनकी स्थिति भी नहीं है कदापि नहीं हा ता ॥ 
(४) शातचला अथात चेचक | 
४७. जा घड़ी हालि इस दीसारी से हाती है उसका बण न 
शिले कर आय हैं। सीलेन मे इसका महारोग कहते हैं ॥ 
पहले घह उपचार करते थे कि जिस मनुष्य का चेचक 
मिफयाले उसके चमं से कुछ चप लेकर 'भले चढ़े सशुष्घ फे 
चर्म में लगा देते थे । ऊिज्न समस॒ब्य के चम में यह चेप लगा 
दिया जाला था उसके चे बक मिरूछ आती थी और प्रायः 
ऐसा होता था कि टसका बल घट जाता था। परन्तु कभी २ 
चेचक ऐसी प्रबल होती थी कि रोगी सरही जाता था। हससे 
थीलारी चली भी नहीं थी। दीका लगाने की यह रीसि 
जिसके अब “ हनावशुलेदशन ? कहते हैं बन्द कर दी गई ॥ 
इससे उस्तम उपचार शाकक्‍टर “जेनर ” साप्टिय ने 
निकाला है जिसका कुछ बणंन पहिले कर चुके हैं। इसका 
नाम उन्हों ने “ वैकसीनेंशन%'” रक्ला क्योंकि पहिले पहिल 
वे गाय के थनें के छाले का चेप काम में लागे थे जिसके 
लगाने से चेथक का जोर कम हा जाता है। अब भी कभी 
इस चेप से जिसका चेचक का दीका लगाया गया हो यही! 
असर होता है और यही चेष प्राथः काम में लाया जाता है ॥ 
सूखे लेग दीका लगाने में सावधानी न करने के कारण 
टीका लगवाना व्थथ समझते हैं। कर्मी तो गाय के थ्नों 


जज लिथिन>->+क »- -० पतले शआा नी पल ते कं क---५०-०क->कीडक---- “--०+-+»»न अममविक8-न-++०ा+मकीक०५०कविशडीिलजआ>त...। 


# लाटिन भाषा के एक शद्ध “ व्याका ' से निकला दे जिसका अर्थ “गाय' के है। 














के छाले का ठीक थेप काम में नहीं लाथा जाता और कभी 
छाले फूट जाते हैं। कम से कम तीन यार छाले अवदय 
होने याहिये और कहे दिन तक इस बात की रक्षा होनी 


साहिये कि छाले रगड़ने न पावें। टीका पहिले ता बचपन में। 


लगाया जाय और फिर एक बार बडे होने पर। यदि इन बातों 
पर ध्यान रहे ता चेचक की वीसारी बिछकुल न रहेगी ॥ 
४८. सब सभ्य देशों में टीछा लगाने की रीसि प्रचलि- 
ते है। कई देशो में तो यह चाल है कि जन्म के थाडेही दिनों 
पीछे मा बाप का अपने बसें के टीका ऊगवाना पडता है॥ 
इस देश मे सकार ने टीका लगानेवाले नियत किये 
हैं और जा लोग याहें दिना कुछ विये दीका लगवा सकते 


हैं। दुडिसान लोग इससे लाभ उठाते हैं ओर उनके बच्चे बच। 


जाते हैं परन्तु झूख लेग सममभते हैं कि जिस देवी के कारण 
चेचक निकलती है वह अप्रसन्न हो जायगी इसलिये प्रायः 
उनके बच्चों का काई न का है अठ जन्म भर के लिये पारा जाता 
है था वेही मरही जाते हें। यदि ऐसाही है तो थह भी क्यों 
म कहें बीसारी इंश्वर की इच्छा से होती हे और इसलिये 
ओऔषधि करना ब्यथ है नहीं ता वह अप्रसन्न हो जायगा ॥ 

सेचक की षीमारी छूने से हो जाती है। एस बीमार 
की संभाल उन्हीं लोगों का करना चाहिये जिनके चेचक 
निकल चुकी हो ओर दूखरे लेग घर छोड़ दें । ताज़ी वायु 
घहुताखत से मिलनी चाहिये। इस रोगवाले के ओढ़ने 
विलछोने जला देना चाहिये । यदि यह पे हो सके तो गन्धक 
वी घूनी अच्छी तरह देकर घुला डार्ूूना चाहिये ॥ 

चेचक के रोगी के पास जाने में लोग बड़ी असाव- 
घानी करते हैं । इसी से बीमारी फेलती है परन्तु विशेष 
रूश्ष रखने से यह एक घा दा घर से आगे न बढ़ेगी । निदान 
टीका रूगाने से बढा बचाव होता है ॥ 


ञ/ 20009 ७०७७,, मयंक 





( ढ९ ) 


२. अकसमात चटना । 
(१) पानी में हवना । 

४९. डूबने से मनुष्य मरजाता है क्योंकि जल के मारे 
फेफड़े में वायु नहीं जा सकती । यदि कोई मनुष्य इबने के 
बाद तुरन्तही निकाल लिया जाय और कुछ भी सांस 
चलने लगे ता वह बच सकता है ॥ 

पहिले छुंह और नथुनों का साफ करो फिर मुंह खाल- 
कर धीरे २ जीभ का आगे खींये जिसमें वायु भीतर जाय। 
गदन और छाती पर का कसा हुआ कपड़ा उतार डाले ॥ 

उस मन॒ष्य का चित्त लिटाकर उसके सिर और कन्धों 
के नीचे तकिये लगा दा जिसमें छाती उठी रहे। फेफड़े में 
वायु जाने के लिये उसकी बांहें का काहनियों के ऊपर पकड़- 
कर उठाओ यहां तक कि दानों हाथ सिर तक पहुंच जायें । 
फिर दो सेकेन्ड बीतने पर वांहों का पसुलियां से मिलाकर 
सख्घूब दवाओ। एक घंटे तक प्रत्येक मिनट में १५ बार ऐसाही 
करते रहो और यदि आवद्ययकता हो तो और देर तक। 
इससे मनुष्य सांस लेने लगता है । गले में पर डालकर 
सहलाने से भी लाभ होता है ॥ 

इसके पीछे शरीर में रूघिर फिरने और गर्मी पहुंचने के 
लिये उस मनुष्य का गर्म कपड़े आद़ाकर मलते रहो। गर्म बाद से 
भरी हुईं थैलीयां या गे पानी की बेतल भी फेरना चाहिये । 

जब कुछ निगलने की दाक्ति आ जावे तब उसे एक 
चमचा गसे कहवा था गे पानी और सदिरा देना चाहिये ॥ 

तीन २ घंटे तक सूछित रहने पर भी लेाग अच्छे उप- 
चार से चंगे हा गय हें ॥ 
(२) घाव | 
७०. थदि घाव बहुत बड़ा 


न हो ता बिना रक्त घाये 
उसपर केवल कपड़े की पद्टी बाधने या “ स्टिकिड हास्टर ” या “स्टिकिडः छास्टर 








( ५० ) 


गाने से भली भांति अच्छा हो जाता है। परन्तु क्‍ 
घाव के भीतर मिद्दी चली गद्े हा ता कुनकुन पानी की 
धार से घाव का धीरे २ था डाले | घाव का खूब ढांके 
क्‍ चा हमे जिससे उसपर मक्खियां न बेठ सकें नहीं ता 
की डे पड़ जार्थंगे । यदि किसी अड़ में चाट लगी हो और 
राधर बह रहा हो ता घाव के ऊपर पट्टी बांधने और उस 
अछू का ऊपर उठाये रहने से रक्त बन्द हो जाता है ॥ 

(३)साच। 

खूब विश्राम करनाही इसका सुख्य उपचार है। शरीर 
के जिस भाग सें माच आगई हे। उसपर कपड़ा लपेटो और 
गस या ठण्ढे पानी से रोगी के इच्छानुसार भिगाते रहा । 
कुल दिनां तक से व की जगह कची अथात्‌ कमजार रहती 

है इस लिये इसड्री सावधानी रखनी चाहिये ॥ 

(४) हड्ी का उखड़ जाना । 

जय हड्डी अपनी जगह से सरक जाती है तब उसके 
डो का उखडना कहते हैं । वह अच्छी तरह घूम नहीं सकती 
और उस जगह का आकार बदल जाता है। जिसकी ह डी 
उखड़ जाय उसे तुरन्त डाक्टर के पास ले जाना चाहिये ॥ 

द (४) हटी हडिया। 
हड़ियों का टूटना अछ्ू के आकार में अन्तर पड़ जाने 
त्रैर बह भाग टटोलनेपर ह डियें के सिरे आपस में रगड़ने से 
जान पड़ता है। तुरन्तही किसी डाक्टर का दिखाना चाहये। 
जिस सनष्य का हड़ी टूट गई हा उसका बहुत कम ।हलना 
हालना चाहिये नहीं ता हडियो की ना का से मांस कट जायगा।॥ 

(६) गले का बन्द हा जाना । 
जा कुछ गले में अठका हे। उसे अंग्रुलीं से निकाल ले 
५९ इण्या पादी शाजने से कमी एजास होता है॥ | भीतर ठेल दा | पीठ पर ज़ोर से घूंसा मारने या मुंह 
पर ठण्ढा पानी डालने से कभी २ लाभ होता है ॥ 




























कै 


( ५१ ) 


(७) आग से जल जाना । 

७५१. यदि किसी ख्त्री के कपड़े में आग लग जाय ता 
इधर उधर भागती न फिरे क्योंकि इससे वायु लगकर आग 
और मसड़कती है इसलिये उसके उचित है कि घरती पर 
लाये इससे आग बुक जाती है। यदि जल मिल सके ता 
उसपर डाल देना चाहिये। सादा कपड़ा शरीर पर लपेटने 
से आग बुर जाती है॥ 

यदि चमे था डाही जला हा ता उसपर ठण्ढे पानी से भिगे 

कर कपड़ा रखने से अच्छा हो जाता है। चमे नप्त न हा गया 

शेताधीया तेल लगाने से लाभ होता है। छाले में छेद करके 

जल निकाल लेना चाहिये परन्तु चमम का हटाना उचित नहीं 

क्योंकि इसके कारण नीचे के नस चसड़े की रक्षा रहती है । 

जब बहुत जलजाय तब डाक्टर का अवश्य दिखिलाना चा हिये॥ 
(८) सांप आदि का काटना । 

थदि किसी मनुष्य के हाथ या पांव में विषैला सांप 
या कुत्ता काटे ता घाव से कुछ ऊपर कस कर एक पढद्धी 
बांधा जिससे शरीर के दूसरे भागों में विष न फेले। इस 
के पीछे उस भाग का इस प्रकार काट डाले कि उस जन्‍्तु 
के दांतों का घाव बिलकुल कट जाय । यदि वह मजुष्य 
ऐसा न करने दे ता लोहा स्वूब लाल करके उस घाव का। 
जऊा दे। । गम पानी बराबर डालते रहे जिससे रक्त का 
बहणा बन्द न हो | ब्रांडी या दूसरी राराब और जल पन्द्रह २ 
मिनद पर देते रहो । जहां थे उपाय न हो सकें तो घाव से 
सिंगी लगाकर रक्त खूब चूस लेना चाहिये परन्तु इस बात 
रा स्मरण रखना आवद्यक है कि जा मनुष्य सिंगी लगाता 
है उस के सुंह या ओआठ में घाव न हा # ॥ 

* थ्रादि मिल सके ला एक प्रकार की उपक्कार्क प्रर्पाच जिसके “ खाड़्कर अमेनियां 
'हतेदें देता चाहिये। इसके पाव २ घंटे में ३० सन्द में थोड़ा जल मिलाऋर देना उचित दे । 

















( ६९२ ) 


एक टुकड़ा कपड़ा सिरके यथा नमक के जल में डुया 
कर यदि घाव पर रस्व दिया जाय ता बिच्छू कमखजूरा और 
 बरे के काटने का दर्द अच्छा हो जाता है ॥ 
(९) विष । 

पहिले ता विष के से निकाल देना उचित है। एक 
बड़े चमये भर राह यथा नसक गमे जल में पीने से प्रायः कै 
हा जाती है। कण्ठ में पर की नाक से सहलाना और कहे 
घूंट गम जल पीना चाहिये ॥ 

अफीम और धत्ूरे से बहुत नींद आती है। के करने के 
पीछे लेज़ कहवा पिलाना चाहिये और सलुष्य का इधर उधर 
टहइलाना भी उचित है। पीतल के बसेनों के कसाव से जा विष 
उत्पन्न होता है उसके द्र करने के लिये अण्डे की सफेदी जल में 
।घिलकर देनी चाहिये और यदि अण्डे न मिल सकें ता दूध में 
लेल मिद्याकर देना उचित है । परन्तु पहिले के अवद्य करा वे ॥ 

३. डाकूर और अस्पताल । 
(१) डाक्टर | 

५२. जब किसी मनुष्य की घड़ी बिगड़ जाती है तब 
|धह अपने पड़ासियों से नहीं खुधरवाता परन्तु उसे घड़ी साज़ 
के पास ले जाता है। जब हम बीमार पड़ें सब हमको उचित 
है कि किसी डाक्टर के पास जायें ओर मां से सम्मति न 
लें क्यांकि इनमें से काह कुछ कहते हैं और काई कुछ ॥ 

किसी अच्छे डाक्टर के पास जाआ जिसने अच्छी 
शिक्षा पाई हो और किसी अधूड़े डाक्टर के पास कदापि न 
जाओ जा जादू दाने आदि की चया करता है या अपनी 
औषधि की लम्धी चाड़ी डींग मारता है ॥ क्‍ 

जब तुमका काई अच्छा डाक्टर सिले तब उसका 
विश्वास करो और उसके कहने पर चले । एक डाक्टर को | 
छे।ड़ दूसरे के पास मत दौड़ते फिरो ॥ 





( (५३ ) 

(२) अस्पताल आदि। क्‍ 

अस्पताल इस देश के सब भागों में लाले गये हैं और 

ऐसी रीति है कि उनमें अच्छी से अच्छी औषधियां और 
चतुर डाक्टर रहते हैं ॥ 

काई २ सूस्य अस्पत्ताल जाना पसंद नहीं करले क्थेंकि 

वे यह समभल हैं कि वहां जाने से हम सर जायंगे | इसमें 

सनन्‍्देह नहीं कि अस्पताल में मी लेग मर जाते हैं परन्तु 

घह वात इस कारण से होती है कि लाग अस्पताल में उस 





। समय जाते हैं जब अच्छे हाने की आशा छूट जाती है ॥ 


जब यीमार पड़ी तब अच्छे डाक्टर का बुलवाआ या 
तुरन्त किसी अस्पताल सें जाओ । छोटा पाधा सहजही में 
उस्बड़ जाता है परन्तु बढ़ जाने पर नहीं उखड़ सकता । यही 
दशा बीसारी की. भी है ॥ 

फिर डाक्टर के कहने पर चला। काई २ ते ०गैषधि ले 
लेते परन्तु खाते नहीं और यदि खाले भी हैं ता उस रीति से 
नहीं जा उन्हें बतलाई गई है। यदि ऐसे लाग अच्छे न हो ले 
कुछ आश्यय की बाछ नहीं ॥ 

ओऔषधि जल्द २ न बदले । काह २ रागी थोड़े दिनों 
लक ओषधि खाने के पीछे किसी अधूड़े डाक्टर के पास चछे 
जाते हैं ओर जब उपकार नहीं हाता तब किसी अब्प्ताल 
में आत हें परन्तु इसमें बहुत देर हो जाती है ॥ 

११५। जनस ओर सरणा का टोण्खा । 


७३. सरकार में उत्पत्ति और झत्यु का लेख्ना अथाल्‌ 
हिसाब लिस्बवा जाता है ओर दशा २ वा में मलुष्य संख्या 
हुआ करती है। सूख लाग इसका लाम नहीं जानते । बहुलेरे 
लाग यह समभते हैं कि यह टिकस बढ़ाने के लिणे किया 
जाता है। परन्तु इससे बड़ा लाभ है ओर इससे दिक्न से 
छुछ संबन्ध नहीं ॥ 





"डे ) 


प्रत्येक सनुष्य यही चाहता है कि सेरी आरोग्य 
ओर छुस्वी रहे। बड़े होने पर जब लड़के परदेद जाते हैं तब 
उनके सा बाप की यह इच्छा रहती है कि वे अपनी क्षेम 
कुदाल चिष्ठी चपाती भेजते रहें ॥ 

पसन॒ुष्य संख्या करने से सरकार का 'भी ऐसाही कुछ 
अभिप्राय है। मसला राजा अपनी प्रजा के मा बाप के समान 
है। लास्थां मन॒ुष्यां का हाल राजा के तभी जान पड़ता है 
जब अधिकारी लाग प्रजा का जनम और मरण का लेखा 
उसके पास 'मेजसे हैं। जब उत्पशि उचित संख्या से कम हे। 
जाती है तब यह प्रगट होता है कि लोग भली दशा में नहीं 
हैं। जब मरण की संख्या बढ़ जाती है तब उसके कारण का 
निरूपण करके उचिल उपाय किये जाते हैं । यदि जनम और 
शरण की रिपोर्ट न हो तो सरकार जा भा बाप के समान 
है नहीं जान सकती फि मेरे लड़के जीते हैं था मर गये और 
न ऐसी दशा में उनकी मलाई की काईं बात कर सकती है॥ 

इंग्लिस्तान में जनम और मरण का लेखा रखने का 
नियम कुछ काल से प्रचलित है जिससे बहुत कुछ लाभ हुआ 
है । हससे लोगों की अरोग्यता में बहुत कुछ उन्नति हुई है । 
प्राचीन काल में १००० सिपाहियों में से १८ प्रति वर्ष मरते 
थे अब १००० में से केवल ८ ही मरते हैं। सरकार चाहती 
है कि इस देश में भी उसी प्रकार बीमारी और मरण की 
संख्या घट जाय ॥ 


९२॥ धआआरेग्यता की शिक्षा के अनुसार काम 


करने की आवश्यकता | 


«४. धाप अपने बच्चों का सदुपदेश देता है परन्तु 
धदि ये न मानें ता उसका उपदेश निष्फल हो जाता है। 
धही दु्ा आरोग्यता की है। अभराग्यता का मुरूष वणन हो 


4 











( ५६ ) 


चुका है इससे पढनेवयालां का तभी लाभ पहुंचेगा जब ये 
उक्त नियमों का प्रतिपालन करेंगे ॥ 
क्‍ किसी समय बड़ाल के एक बड़े गांव में बहुत लेाग 
मर गये। वहां के सजिस्ट्रेट साहिब इसका कारण सखाजमे 
के गये । जब उनको ज्ञात हुआ कि पीने का जल मैले और 
बन्धे छहुगे तालायों से लिया जाता है तब उन्हीं ने दश कुएं 
खदवा दिये जिससे साफ निमेल जल मिलने लगा। जब कुछ | 
दिनां में वह फिर वहां गये तब जान पड़ा शशि लोग उन 
कुओआं का जल काम में नहीं लाते। लागों ने इस बात का | 
माना कि जल अच्छा है परन्तु हम लोगों में मैले तालाब से 
पीने का जल लाने की चाल है इसलिये हम इन कुंशों का 
जल नहों पी सक्ते। यह उनकी बड़ीही सूखेता थी | हमकीा 
उचित है कि बुरी रीति का छाड़कर अच्छी रीति पर 
चलें ॥ द 
गरीब और सूख लेागों का स्वच्छता का आचरण 
करना पहिले पहिल अखरता है परन्तु धीरे २ उनके ज्ञान 
हो जाता है कि इससे बड़ा लाम है। जे लोग आरोग्यता 
पर कुछ ध्यान नहीं देते उन्हीं का प्रायः बीमारी होती 
है। अमीरों का बीमारी सें रुपयों ओर नैाकर चाकरों से 
सहायता मिलती है गरीबां के पास इन दोनों सें से एक | 
भा नहा 
यदि तुम आरोग्य रहना चाहते हो ता शुद्ध वांसु निम्नल 
जल और छहिलकारी 'भाजन मिलने का प्रधन्न करो । स्वच्छता 
पर भी विज्वेष ध्यान रवखा । मेलापन रोग की जड़ है ॥ 


7 निलिलिलिक 








ध्रश्नसाला । 


(डर पकरमाणम री कुडरकी5०००काकसक, 





हा , श्ाराग्यता क्या है? पग्रारोग्य रहने पर हमर कान कमान सी बाते 
ऋर सकते हैं? बीमारी से क्या परिवतसेन हेते हैं? किस मनुष्य के 
ब्रिश्वाम नहीं मिलता ? किसके अपना जोवन अच्छा जान पडला हे?॥ 


जब लड़का बीमार पडता हे तब वया होता है? जब बल की 
मा बीमार हो जाती है तब क्या अनथे होता है? जब कभी #च्ये का 
बाप बोमार पहला हे तब क्या २ अनथे होते हें? ब्याराग्वता छा 
+ख हमके कज जान पड़ता है? ॥ 


्. 


२. मखख लोगां के समभ में बोमारो के हाने का क्या क्रारण 
जता हे? ॥ क्‍ 

३. आरोग्यता की विद्षा का क्या अर्थे हे? दग्लिस्तान में ज्यः 
की दशा में क्या अन्तर हुआ? केतढठ को क्या दशा है? प्राचीन क्राल मे 
शोलला से क्या हानि होतो थो? पव को अपेज्ञा दंग्लिस्तान में अत 
लाग शीतला की बीमारी से कम छ्थां मरते हें? इस छेोटो सो पुस्तक के 
पढ़ने से क्‍या लाभ है? ॥ 

४७, हमकेा जोते ग्शन के लिये विशेष करके किस ३ बात को 
शायश्यकता है? घायु का देना हमर के केसे जान पड़ता है? संसार 
क्रिश् वस्तु से घिरा हुआ है? वायु का समुद्र क्रितना गहिरा हे? एक 
प्याले क़रवा में हम्र कोन सो चार वस्तु पोते हैं? प्राचीन काल में 
लाग बाय के किन वस्तुओं से बनो हुई समरकते थे? बिद्दानों ने अब 
कथा जांच की है? ॥ 


५. संसार में क्वान २ सीन प्रकार की वस्त हैं? “सालिहस, 
लिक्किद्स, ग्यासेज़ ” क्रिसका कहते हैं £ घाय को “ग्यासें ? के हम क्या 
कर सकते हैं? इन “ग्यासों” में से एक का क्या नाम हे? इससे 
क्या २ उपकार होते हे? द्सरो क्ानसो ग्यास धाय में मिली हें? क्यों 


मिली है? वाय में कितनो “ जरा क्लिजन ” ओर कितनो “ नाहेट्रेन्नन ” है? ॥ 


(>> - "पाक कनमनन«- जे. 








: २४४० भ्याए जधकाथा॥ २४४०५ कट कब सकमातकापछ ++ ७» ८४ 4 ओम 





यक्टजर॒फ्रातपर कक परकना तक कविकिवडका पक 





( ५७ ) 


€. धाय में क्रानसी तोसरी वस्स पाई जातो हे? धह किससे बनी 
२० “क्ारबानिक एसिड ग्यास ” का प्रकाश पर क्या प्रभाव होता हे! 
यह दत्ता के किस काम आतो हे? “ फरारबानिक एसिड ग्यास ? बाय में 
किस प्रमाण से रदलो है? बाय में ओर कानसो दस्स प्रद्िष्ट हैं? उससे 
क्या उपकार होते हे? बाय में जा चार वस्तु पाई जाती हैं उनके 
[नाम्म ला? ॥ 
७. कान विप से प्रायः लोग मर जाते हें? “ब्वक होल” अथात 
काली फ्राठरों में लागा की क्‍या दशा हद? याय के बिगड़ने का का 
एक कारण वबणन करो? धाय से सदा दमारा क्या काम ननकलतला हे? 
सांस लेने में घाय ऊद्दां जाती दे? उससे क्या काम निकलता हे? 
खराब रक्त क्या हो जाता हें? ॥ 


८. जा वाय सांस के साथ बाहर निकलती है उसमे कान तीन 
क्षस्त मिली रहती हैं? यदि हम किसी बन्द काठरी में साए ले वहां 
की याय में फोन बस्स मिल लाती हे? तम केसे जानते हो कि तम्हारे 
सांघ जलने में जल की भाफ निकलतो हे? सांस लेने में जे जल मिक्कलता 
है उसमें कया मिला हें? बन्द कऑाठरो में सांस के साथ लोगों के शरोेर 
के भीतर क्रानसी बस्स जातो हे? ॥ 

८. क्रानसा दखरा कारण है जिससे बाय बिगड़ जातो हे? बन्द 
बनेन में दिया तसन्स क्यों बक जाता हैं? क्रानसा तोसरा कारण हे 
जिससे घाय बिगड़ जाती है? जब कादर जन्त मर जाता है या पाधा सख 
जाला हे तब क्या होता हे? धस्तओं के सड़ने से बाय लिख र भांति 
बिगड़ जातो हे उनका बणेन करा? 0४ 

१०, यदि बाय स्खच्छ न डहोतो रहती ला संसार कसा हो 
जाता? हवा के स्वच्छ करने के तोन मख्य प्रकार कान कान से हें? 
ग्याप्ताी के मिलने का क्‍या अथ हे? चलतो बाय से कानसा लाभ होता 
है? पाधां के भोलर कानसों वस्तु जातो है ओर कानसी वस्तु बाहर 
निकलती है? ॥ 

११. स्वच्छ धाय के लाभ घन करो? स्वच्छ वायु को विशेष 
करके कब आधिक ग्राक्षश्यकता पड़तो हे? हमारे पास को धायु किम 
पस्सओ से बिगह जाती हे? स्वच्छ बाय को किसका सबसे अधिक 
ग्रायश्यकता पढ़नी है? बाहर अच्लुत स्थच्चद वायु होने के शिवाय श्रोर 
िियंकललि लि मिलिकस के किक असली ल 


( (६८ 5 


कहां धाय की ग्रावश्यक्रता हे? खाय क्योंकर रुक ज्ातो हे? हमारे 
शोर के भीतर जाने से घाय फेसे रुक जातो हे? ॥ 

१२९. जल के बिना क्या दशा होगो? हम्तारें शरोर में कितना 
जल हे? इतना अधिक छाल क्यों हे? जल कहां जाता हे? थदि जल 
बिगड़ा हो ते क्या परिणाम होगा? अधिक बोमारो क्येकर होती हे? 
पोने फे सिवाय जल से ओर कानसा लाभ देता हे? जल से कत्ां के 
कौनसी सद्ायता मिलतो हे? ॥ 

१३. कहां से अधिक्र जल मिलता हे? समद्र क्यों नहों भर जाता 
है? सप्य को गर्शोा से जल क्या होता जाता के? जल केपे बरसता हे: 
बरसात के दिनो में नदियां को क्या दशा होतो है? सख्े दिनों में क्या 
दशा होतो हैं? जल का रेर फेर केते हुआ करता हैं? बरसात का 
जल केसे ब्रिगड जाता है? 0 

१४. बरसात के दिनों में नदियों का गदलः” जल केपे स्वच्छ हे। 
है? दलदल का जल क्यों ख़राब होता है? जल क्रा विष क्या 
कर दूर हा सकता रे ? किन २ केक से नदियों का जल बिगड़ 
जाता है? कशो नदियां का जल बहुत अ्रघिक्र बिगड़ जाता हे? नदियों 
के धघिष्य में कया करना चाहिये/ ॥ 

१५, तालाबों का जल कैसे जिंगड जाता हे? क्रिन तालायों का जल 
बिगड़ा रदला हे? क्या करना चा हिपे ? सालाधों का जल क्येंकर स्वच्छ रह 
सकता है? किन २ कामो के लिये दसरा तालाब होना चाहिये? मनष्यां के 
घप्तान चापाणा को केपे हानि हाोतो है! उत्तम जल केपे मिल सकता है? ॥ 

१६. कान से कुएं उत्तम होते इ? जिन कुंओं मे जल घरतोी के 
पास से जाता है वे क्येकर बिगड़ जाते हैं? इस देश के कंंझा में कानस। 
डा दाथष हे? कंओ में स्वच्छ जल होने के लिये क्या २ उपाय ऋरना 
चाहिये? किन २ बातां से कओ की हानि होतो हे? कंओी के प्राप्त 
का ऋडा ऋश्कट क्‍्पाकर हानिकारक होता है? ॥ 

९७, निमंल जल किसका कहते है? कब्र जल भारी ओर कब 
हलका हेता हे? इंग्लिस्सान के बहुतेरे नगरों में अब केसे मिलता हे? 
हिंगठ़े जल को काम में लाने के पहिले क्या करना चाहिये? जल केसे 
काना जाता है? पीने के पदायथीं में जल क्यों उत्तम दोता हे? नशे को 
इस्‍्तुओं के खाने था पीने से क्‍या दोता हे? ॥ 


-६ री" अरबाज ही.“ सरवीक#कक, ०. +कफ५७ ५७» >2-4>मकःमकेपु॥०-०-..:4७0७७७4.०-०-- +-३०कक.-९००-५ ९५ आई... रवाभकरमफमदीक, >>. भा. क्‍आ+->परशीविडीबक-+. जम 








































० शरोर से व्यर्थ बसत क्या हो जातो हे? धर्म से खराब धः 
कप्त निकलतों हे? पसीना क्या हें? पस्रोने के साथ क्या निकलता है; 
केाटो २ नालयों के मंद्द केपते खने रहते हैं? जब नलियों के मंद्र बन 
रदते दे तब क्या होता हे? ओर भो क्या स्वच्छ रखना चाहिये? ॥ 


१८. हमके के बार नहाना चाहिये? नहाने का सबधते 5त्तम 
समय फ्रान दे? स्वच्छ जल क्ये काम्र में लाना चाहिये? नहाने से लोग 
कंयाकर बोमार हो जाते हैं? क्रिसका कनकना जल काम में लाना चाहिये: 
रोगियों कला केपे नहलाना चाहिये? ॥ 


२०. हमकेा भर क्यों लगतो हे आर पत्थर को मत्ति को नहों | 
रेल की दंजन में बल कहां से आता है । हमारे शरीर में केसे बल होता 
हैं । खाने से कानसी कमी परी हो जाती है? बल आने के उपरान्त हमारे 
शरीर को खाने से क्या लाभ दाता हे? प्रतिदिन शरीर में कितनो 
गर्मों उत्पन्न होती हें? ॥ 


२१. खाने में क्योंकर प्रेद होता है? किस बात के लिये खाना 
हम का आवश्यक्र हैं? किस वस्त से बच्चा के खाने को कमी परो होती 
हैं? मनष्य का मख्य भोजन क्या हे? अनाज में कया अन्तर हे? कोन 
से खाने बलऋरो होते हं? चिकनरह से क्या होता है? जो लोग विशेष 
कर बावल, घो ग्रोर मिठाई खाते हैं उनकी क्या दशा होतो हें? ॥ 


न्‍० किन २ प्रकार के भोजन अहित होते हैं? किस समय खाने 

में अधिक सासधानी चाहिये? उस्त समय किन बस्तओं से परहेज़ ऋरना 
चाहिये? मसाला के किस प्रकार काम में लाना चाहिये? पान खाने से 
क्या बिगाड़ होता है? तमाख पोने का अभ्यास न करना क्यो अच्छा 
हैं? कानसी बातों से अधिक हानि दहोतो हे? भेजन बनाने प्र छिस 
बाल का अधिक ध्यान रखना चाहिये? ॥ 











२३. हमे कब भेाजन फरना चाहिये? समयहो पर पयों 
भाजन करना चाहिये? सवेरे के समय थाडासा क्यों खाना चाहिये : 
क्रिस ए समय दो बार उत्तम भोजन करना उचित है? भोजन करने 
से कब परहेज़ ऋरना चाहिये? भेजन फरने से बहुत लागाो को किस 
प्रकार द्वानि होतो हे? किस कारण भेजन के ख़ब चबाना चाहिये? ॥ 











.ः ६० ) 





- 





२४. लो दल आन्धेरं में लगाये छाते हैं थे केपते हो जाते हैं? 
उल्लेला न मिलने से मनुष्य को क्या दशा हो जातो हे? घान्धेरें घर के 
निर्मिस कानसी कहायत प्रसिदु है? घर में प्रकाश से कया लाभ होता है? 
(किनक्रेा घर प्र बन्द रखने से क्ष्या हानि पहचती हे? धप में रहने 
से क्या हाता हे ? किन बालों को रता करना आवश्यक हे? 0 


२०. भित्च र ऋतओं में कसे फपड़े पदिनने चाहिये? सदी के दिनों 
में बहुत लाग क्या मरत हैं? शरीर के दे अत्यन्त सकमार भाग कान 
से हें? उनको रत्ता केस होनी चाहिये? रात के धमय क्यों कपड़ा 
बदलना उचित हे? किस प्रकार के कपड़े से हानि होती हे?! 0 


शद. पट्टे किसका करते हें? पट्टे केपे बलवान होते हैं? कसरत 
करने से सांस लगने में क्या प्रभाव उत्पच् हाता है? कप्तरत करने से व्यथे 
बस्ल फेस निकल जातो है? कप्तरत करने से हमकेा कानसा टसरा लाभ 
होता है? कसरत न करने से लाग केसे हो जाते है? ॥ 


३६. किन लोगो का खेल पसन्द हें? खेल से घालकों को 
क्या लाभ होता है? बालकोी का कहां कप्रत करने का थोड़ा अवकाश 
मिलता है? कसरत न करने से किन लोगों को कभी २ हानि होती है? 
किसी २ सप्य उन लोगों को क्या दशा हु है? कसरत करने से भेजा 


' ध्थात्‌ दिमाग़ केसे बजवान होता हैं? कप्तरत ऋब न करनो चाहिये? ॥ 
! ॥226 कक अर ३ 0" १ की पक 
! ए८, न सोने से हमके क्या हानि होती हें? सोने से क्या लाभ 


हाता है? बच्चा, लड॒काों, लड़कियों ओर परुषा के। के घंटा साना चांदिये ; 
' भोन्द के विष्रय प्रें क्या कह्ाावल है? ॥ 
२९८, किन २ कारणों से बरे स्वप्ठ होते हैँ? स्वप्न क्या हैं? स्वप्न 
'घे क्या प्रकट होता हे? स्खप्न किसका दिखलाई देते हें? लोगो के 
| भि पर कब साना चाहिय! घरतों एरए साना कब दखदाद देता हे? 
कर से बचने के लिये चारपाई से क्यें सहायता मिलतो हे? भरप्म 
नम रहने पर क्या करना चाहिये? बिछाने का स्वच्छ शरखना कथा 
उच्चित हे? 8 
३०, बन्द काठरियों में सोने से क्यों हानि होतो हे? सोने समय 
क्रानसोी बे बान के कारण शद्ु बाय नहों मिलतो? लोगों के। खले 
मेंढान में कब सोना चाहिये ग्रोर कब नहों? जहां थाय थेग से चलतो 





[..... (६४१)! ] 
( ( 8१ ) | 
' दि द नग्न ऋ ०, ० आर बल प कक न 
| है। वहां का से।ना क्‍यों बए हें? कब विशेष करके रात के समय शररोर 
का गमे रखना उचित हें? ॥ 


३१. फटा पर मझान न खनाना चाहिये? किप प्रकार की भपि 
। पसंद करना चाहिये? कंप्ती जगह मकान बनाना चाहिये? मकान को 
| कप्तो क्यों ऊंचो रखनों चाहिये? छत क्यों ठलओं रखनी चाहिये? सेंकरो 
| टैेकी गलियां क्यों खराब होती हें? किस प्रकार के मकान सस्ते दोने 
पर भो न लेने चाहिये? ॥ 


३२९. जब एक स्त्री ने आपनी श्रद्दिन दा हाल पक्का तब उसने क्या 
उत्तर दिया? उसने आपग्य रहने का क्या कारत बणन किया? सब 
उस स्त्री ने कानसा प्रश्न क्रिया? उसकी बहिन ने क्या उत्तर दिया? 
निदान उसके क्या फरना पड़ा? तब फ्या दशा हुई? ॥ 


३३. वाय के संचार से क्या तात्पये है? घर में सबसे ग्रावश्णक 

225 ३५ अत नबाक 5 ००. 
बात कानसी हे? कितनी जगह प्रत्येक मनष्य का मिलनी चाहिये? 
| फीपदी में प्यों कम जगह योग्य होतो हे? पहले घर्त में श्र वाय को 
अधिक आवश्यकता क्यों पडतो हे? कानसी काठरी बहुत ख़राब होतो 
हैं? साने के कमरों में बाय का संचार क्यों कम हो जाता है? ॥ 


३४. कानसी वस्तुओं से बाय वेसीही खराब हो जातो हे जेसे। 
| जन्तओं से? बाय के आने जाने के लिये कप्रम्ते कम कितनी खिड़िक्रियां' 
होनी चाहिये? किप्त प्रकार बिगड़ी बाय बाहर जा सकतो ओर स्वच्छ 
बाय भीतर आ सकतो हे? 'क्रारब्रानिक ऐसिडग्यास ” के विष से लाग 
पाकर मरते हें? हम कैसे जान सकते हैं कि कमरे को बायु स्थच्छ 
| है? स्थरियों के कमरों में कानसी वस्तु दोनो चाहिये? ॥ 

३५. घरों को के बार साफ़ करना चाहिये? घर को प्रतिदिन! 
धोने से क्या हानि देती है? घर का कूड़ा करकठट किस जगह फेंकना 
चाहिये? उसका क्या करना चाहिये? घरके ग्रासपास कूडा फेंकने के लिये 
गडड़ा क्यों न बनाना चाहिये? ऐसा लाग क्ये करते हें? इससे कथा 
होता हे? मेले को दगन्ध क्यांकर दर जाती है? इन दिनों मेले से क्या 
हानि दहातो हं? रससे कया लाभ दे सकता है? ॥ 


३६. घर के चारों ओर को वस्तओं के विषय में क्या प्रबन्ध फरना 
उचित हे? घर में गाशाला आदि क्यों नहों बनाना चाहिये? खाद का 





५-ककलक चीन न. 


० >>्फययलिकनर 








जे (_ ६२ ) 


8८ कहां रखना चाहिये? गडहों का क्यो पाट देना उचित हे? नहरों के 
विष्रय में किम ब/त का ध्यान रखना चाहिये? कानसी बालों से खराबी 





के ०० ०० हक | कप १ 2७ 
दूर दो सकती दे? किस बात से मलेरिया दर हो सकतो है? ॥ 


३७. किसका नगरों ओर देहात के रहनेवालों को आरग्यता 
का देखना चाहिये? इसमे सबके ब्यांकर लाभ हे? अधिकारियों से 
कानसे काम विशेष करके सम्बन्ध रखते हैं? नहरों का मेला क्या दे: 
इंश्लिस्तान में इसको कसी सफ़ाद होतो हे? हिन्दुस्तान में यह उपाय 
किस २ क्रारण से नहीं किया जाता? सस्ते नल केसे बन सकते हैं? ॥ 

३५८५. पायखानों के विषय में किस बात का ध्यान रखना चाहिये? 
गलियों के कहे का क्या करना उचित हें? नहरें केसी बनानी चाहिये 
शदु बाय क्योंकर अधिक मिल सकतो हे? चमारों ओर रदरेज़ां से कहां 
पर काम कराना चाहिये? म॒र्दों के गाड़ने और जलाने को जगहों का 
कैसा प्रजन्ध होना चाहिये? ॥ 

३८, ओपषधि करने की अपेता कौनसा काम उत्तम हें? कोई २ 
लोग दस्लाधर ओपषधि क्यों खा लेते हैं? यद्द क्‍्यां दुःखद होती हे? 


ऐसी ओषधि खाने का क्या भय हे।ता है? किस समय तुरन्त औषधि 


खाना चाहिये? हलकी बीमारी प्रायः क्योंकर अच्छी हो सकती हैं? ॥ 
४०, प्रायः रोगी क्यो मर ज्ञाते हैं? सबसे ग्रायश्यक बात कानसी 


| है ? किस लिपे? स्वच्छ रखने के लिये क्या ऋरणा चाहिये? भाजन में क्या 
सावधानी करना उचित है? चुपचाप रचना ग्रार रोगो पर दया करना 


२०५ 8 रि ४5 
क्या उचित है? ॥ 
४१९. बच्चों के लिये कानसी चार बातें विशेष करके आवष्यक| 


हैं? छोटे बच्चां का क्या भाजन होना चाहिये? बच्चा का कब टोका 


्य छत. के क् ँः * रच 
लगाना उचित हो? बच्चां का किस बात से अधिक हानि पहुंचतो है? 
बच्चे! का किस लिये स्वच्छता का अभ्यास कराना चाहिये? शात प्र 
फानसो घात का ध्यान रखना आवश्यक हे? ॥ 


४२. हिन्दुस्तान में लाग प्रायः किस बोमारो से मरते हें? प्रायः 
ज्यर का क्‍या कारण होता हे? “मलेरिया ” बिश्षेष करके कहां उत्पत 
हे।ती हे? किस समय उससे अत्यन्त भय दोता है? इंग्लिस्तान में जड़ी 
प्रयांकर जातो रही? ज्यर को ग्रोषधि करने में केानसी भल इस दश 
फे बदा करते हइं? 0 


[._.. (९११) कर _ 


.. ४३. जउ्वर को सबसे उत्तम ओषधि कानसी हे? उ्यर से बजने के 
लिये कानसो बाते पर ध्यान रखना चाहिये? जब उ्यर फंला हो हब 
केानसी ओषधि खाना याहिये? अत्यन्त बरे प्रकार का ज्यर किस कारण 
आने लगता है? शरीर में विष क्ये/कर पहुंच जाता हे? 0 





४४. संपगरखो किशके करते है? प्रायः दस बोमारे के होने का 
त्रया कारण हे? प्रायः यह बीमाए क्येंकर दर हो सक्ततो हे? अतिसार 
क्रो बीमारी क्येंकर ज्ञान पढ़लो हे? क्या करना उचित हें? अत्यन्त 
प्राधधानो रखना क्यों आ्रावश्यक हे? संयदणो ग्रार अतिसार किन उपायों 
पे बक जातो हे? 0 


४५. कानसो बीमारी बड़ी भयदूर है? क्यों अच्छे डाकुर अनुमान 
करते हैं कि कार २ बोमारी शीतला के समान फेलतोी है? किन २ ऋाप्णोा 
से बोज उत्पव होते हें? किन २ वस्तग्रों से ये बोज नहों उत्पनर दोते 
ह.- हेजे के बीज विशेष फरके केसे फेलते है? जिन दिनों में हेज़ा फेला 
है! तब कानसे उपाय करना चाहिये: किस पर भरोसा करना चाहिपे? ॥ 

४६. हेजा के हाने का प्राय: क्या कारण होता हे? यह बोपमारी 
क्येंकर अच्छी हो सकतो हैं? जब हेज़ा फेला हो तब कानसो वस्स घर 
में रखनी उचित हे? जिस मनष्य का हेजे की बीमारी हो जाय उसका 
अ्या उपचार करना दाहिय? क्रिस उपाय से यह बोमारएे नहीं फेलतो: 
जे का टर करने के लिप भत्ता का प्रसन्न करने में नाच तमाशे से क्या 
हानि दाती हें? किस ध्ात का सदा ध्यान रखना चाहिये जिससे 
धज़ा न हो? 0 

न लद॒ग में शीतला को बीपरारी के क्या कहते हैं? शोतला 
रोकने के लिये पहिले कानसा उपाय किया जाता था? क्रानसा सब 
से उत्तम उपाय निकाला गया ? कोई २ म्र्ख लोग टोका लगाना क्यों 
व्यपध समझते दें? ठोका लगाने में किस बात को साधधानो रखनो 
चाहिये? लागो के कब टोका लगाना चाहिये? ॥ 

४८. बिना फ़ीस लिये कानसे लाग बच्चों के टीका लगाते है? 
बद्धिमान लागी का इससे क्‍या लाभ दोता हे? मा का दस विवय 
ब्चार हैं? ऐसा सोचना क्या भ्रल हे? शीतला को बोमारो में घिशेष 
करके किस बात को सावधानो फरनो उचित दे? कानसें उपाय करना 
चाहिये? प्राय: यह बोमापे केसे फेलतोी दे? ॥ 


# 77 +>सबरी.. आयकर जब, 


















( दहै४ऐ ) 


हट. जब काए मनष्य पानो में डब जाय तथ् क्या करना चाहिये? 
2ने से क्येंक्र लोग मरते हैं? मनुव्य केसे चंगा हो सकता है? जब 
मनष्य डब जाय और सांस आतो हो तब प्रथम क्या करना चाहिये? 
सांस चलाने के जिये क्या करना उचित हे? शशेर में रुधिर का संचार 
और गर्मो .पहुचाने के लिये क्‍या करना चाहिये? ॥ 

५०, घात क्थेंकर आशम हो सकते हैं? ओर प्रा क्येंकर हो 
सफती हे? च्ठी का उस जाना क्रिस का कहते हैं? ऐपो अवस्था मे 
क्या करना चाहिये? टटो इडियां कंपे जान पडतो दे? जब गला बन्द 
हो जाय तब क्या फरना साहिये?॥ 


५९. जब किसो स्त्री के कपडे में ग्राग लग जाय तलब उसके क्या 
न ऋरना चाहिये? किस लिप्रे? उसझा क्या करना चाहिये? यांद चरम 
धाडा जल जाय ते क्येाकर ग्राशाप्र हा। सकता हैं? यदि चम्मे समस्स न 
बिगड़ गया हो लो उस समय कानसो खस्सल लगानी अति लाभदायक 
हाती हैं? छालों के क्या करना चारदियें? जब बहुत जल जाय तलब 
क्या कर्ना उचिल हू? ॥ 

४२. बोघारे की अवध्या में क्रिस्फो सलाह लेनी चाहिये? किन 
डाऋरों की आषाधि न ऋशतो याहिये? उत्तम ओषधि ओर भल हाकऋर 
कड़ा मिलते हू? आस्पताल में भ्रेदल से लागा के मर जाने का क्‍या कारण 
है? किन नियमों के अनुसार चलना वाहियें? ॥ 

४३, सरकार में जनम आर भरण का लेखा क्यों लिखा जाता 
है? जग लाग कम उत्प् होते है सब दर क्या प्रकट होता हें? 
जब लाग बचुत मरते हें तब सरकार क्या करतो हें: दग्लस्सान में 
बीमारे कितनी घट गई? ४ 

५४. सदुष्देश कब निष्कल देता हे? दस पंस्लक्ष से कब लाभ 
है। सकता हे! अच्छे कंओ से एक बड़े गांत्र के लोग के क्यें नहीं लाभ 
हुआ - क्कानसो रोलि माननो चाहिये? बीमारी में किसके अधिक ऋष्ट 
क्‍ पड़ता दे? आराग्यता के लिये कानसो मुख्य बाल आवश्यक हैं? ॥ 


छा